भगवान जगन्नाथ की भक्ति और रथ यात्रा से जुड़ी एक ऐसी कहानी है, जिसकी शुरुआत एक छोटे से बालक की अटूट श्रद्धा से हुई थी। यह बालक कोई और नहीं बल्कि अभय चरण थे, जो आगे चलकर पूरी दुनिया में श्रील प्रभुपाद के नाम से प्रसिद्ध हुए।
बचपन में अभय के मन में भगवान जगन्नाथ के प्रति गहरी आस्था थी। उन्होंने अपने पिता से इच्छा जताई कि वे भी भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकालना चाहते हैं। उनकी इस भावना और भक्ति को देखकर एक वृद्ध बंगाली महिला ने उन्हें एक छोटा रथ भेंट किया।
इसके बाद बालक अभय ने मोहल्ले के बच्चों के साथ मिलकर कोलकाता की हैरिसन रोड पर पहली बार रथ यात्रा का आयोजन किया। उस समय बड़े रथ बनाना बहुत कठिन और महंगा था, लेकिन भक्ति के भाव से लगभग तीन फीट ऊंचे छोटे रथ को सजाया गया। इसमें हरिनाम संकीर्तन, भगवान की आराधना और भोग अर्पण के साथ यात्रा निकाली गई।
यह छोटी सी शुरुआत आगे चलकर एक महान आध्यात्मिक परंपरा की प्रेरणा बनी। आज भी कोलकाता की गलियों में बच्चे छोटे-छोटे रथ सजाकर भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाते हैं।
इसी भावना को आगे बढ़ाते हुए इस्कॉन कोलकाता द्वारा हर वर्ष भव्य रथ यात्रा का आयोजन किया जाता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु शामिल होकर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त करते हैं। यह यात्रा कोलकाता की प्रमुख सड़कों से होते हुए भक्तों को भक्ति, सेवा और आध्यात्मिक आनंद से जोड़ती है।
एक छोटे से बालक की भक्ति से शुरू हुई यह यात्रा आज लाखों लोगों के लिए आस्था और प्रेरणा का स्रोत बन चुकी है। यह हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति के लिए साधनों से ज्यादा जरूरी है मन की श्रद्धा और भगवान के प्रति प्रेम।