भगवान श्रीजगन्नाथ की रथ यात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आस्था, भक्ति और सनातन परंपरा का जीवंत प्रतीक है। हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ भव्य रथ पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। मान्यता है कि यह यात्रा भगवान के अपनी मौसी से मिलने जाने का प्रतीक है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान जगन्नाथ की मौसी कौन हैं? धार्मिक ग्रंथों और स्थानीय परंपराओं में इससे जुड़ी दो प्रमुख कथाएं प्रचलित हैं।
रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ क्यों जाते हैं मौसी के घर?
पुरी की प्रसिद्ध रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा अपने रथों पर विराजमान होकर गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं। यहां भगवान सात दिनों तक विश्राम करते हैं और फिर बहुदा यात्रा के माध्यम से वापस श्रीमंदिर लौटते हैं। इस पूरे आयोजन को भगवान के अपनी मौसी के घर जाने की परंपरा से जोड़ा जाता है।
पहली कथा: रानी गुंडिचा कैसे बनीं भगवान जगन्नाथ की मौसी?
पौराणिक मान्यता के अनुसार, राजा इंद्रद्युम्न ने पुरी में श्रीजगन्नाथ मंदिर का निर्माण कराया था। मंदिर बनने के बाद भगवान की मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा के लिए योग्य पुरोहित की तलाश की गई। तब देवर्षि नारद ने सुझाव दिया कि स्वयं ब्रह्मा जी ही यह कार्य कर सकते हैं। राजा इंद्रद्युम्न ब्रह्मलोक चले गए, लेकिन वहां से लौटने में कई युग बीत गए। इस दौरान रानी गुंडिचा ने अपने पति की प्रतीक्षा करते हुए कठोर तपस्या और समाधि धारण की। जब राजा ब्रह्मा जी के साथ लौटे, तब मंदिर रेत में दब चुका था। बाद में खुदाई कर मंदिर को पुनः स्थापित किया गया और ब्रह्मा जी ने भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्राण प्रतिष्ठा संपन्न कराई। रानी गुंडिचा की भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान जगन्नाथ ने उन्हें मां के समान सम्मान दिया और कहा कि वे उनकी मौसी हैं। भगवान ने यह भी वचन दिया कि वे हर वर्ष उनसे मिलने अवश्य आएंगे। इसी कारण आज भी भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा के दौरान गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं, जहां सात दिनों तक विशेष पूजा-अर्चना होती है।
दूसरी कथा: देवी अर्धशोषणी को क्यों कहा जाता है मौसी मां?
पुरी में स्थित मौसी मां मंदिर देवी अर्धशोषणी (अर्धासिनी) को समर्पित है। स्कंद पुराण के अनुसार, एक समय समुद्र का जलस्तर बढ़ने से पुरी और श्रीजगन्नाथ मंदिर पर संकट आ गया था। तब देवी अर्धशोषणी ने अपनी दिव्य शक्ति से बाढ़ का आधा जल पी लिया और मंदिर की रक्षा की। तभी से उन्हें पुरी की संरक्षक देवी और भगवान जगन्नाथ की मौसी माना जाने लगा। एक अन्य मान्यता के अनुसार, जब माता लक्ष्मी किसी कारणवश श्रीमंदिर छोड़कर चली गईं, तब मंदिर में अन्न का अभाव हो गया। भगवान जगन्नाथ और बलभद्र को भोजन के लिए भिक्षा मांगनी पड़ी, जबकि देवी सुभद्रा अपनी मौसी अर्धशोषणी के घर चली गईं। वहां देवी ने सुभद्रा की मां की तरह सेवा और देखभाल की। तभी से भगवान जगन्नाथ उन्हें भी अपनी मौसी मानते हैं।
रथ यात्रा के दौरान मौसी मां मंदिर पर क्यों रुकता है रथ?
बहुदा यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ का रथ मौसी मां मंदिर के सामने कुछ समय के लिए रुकता है। यहां देवी अर्धशोषणी भगवान को पारंपरिक ओड़िया व्यंजन ‘पोड़ा पीठा’ का भोग अर्पित करती हैं। यह परंपरा आज भी पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जाती है और लाखों श्रद्धालु इस दिव्य दृश्य के साक्षी बनते हैं।
रथ यात्रा का आध्यात्मिक संदेश
भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा हमें प्रेम, परिवार, सेवा और वचन निभाने की प्रेरणा देती है। चाहे रानी गुंडिचा की तपस्या हो या देवी अर्धशोषणी का मातृ स्नेह, दोनों कथाएं यह संदेश देती हैं कि सच्ची भक्ति, समर्पण और सेवा का स्थान भगवान के हृदय में सबसे ऊंचा होता है। यही कारण है कि पुरी की रथ यात्रा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति, श्रद्धा और आध्यात्मिक एकता का अद्भुत उत्सव मानी जाती है।