ओडिशा के पुरी में आयोजित भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा विश्व के सबसे प्रसिद्ध धार्मिक उत्सवों में से एक है। रथ यात्रा आरंभ होने से पहले एक विशेष परंपरा निभाई जाती है, जिसे ‘छेरा पहरा’ कहा जाता है। इस रस्म में पुरी के गजपति महाराजा भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के रथों के सामने सोने की मूठ वाली झाड़ू से प्रतीकात्मक रूप से मार्ग की सफाई करते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और रथ यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।
पुरी के गजपति महाराजा हैं भगवान के प्रथम सेवक
जगन्नाथ मंदिर की परंपरा के अनुसार पुरी के गजपति महाराजा को भगवान जगन्नाथ का प्रथम सेवक माना जाता है। वर्तमान में यह दायित्व गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव निभा रहे हैं। वे रथ यात्रा के दौरान स्वयं छेरा पहरा की रस्म निभाते हैं और भगवान की सेवा करते हैं। गजपति महाराजा श्री जगन्नाथ मंदिर की कई पारंपरिक धार्मिक व्यवस्थाओं से भी जुड़े हुए हैं और मंदिर समिति के प्रमुख के रूप में अपनी भूमिका निभाते हैं।
17 वर्ष की आयु में संभाली थी जिम्मेदारी
गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव, गजपति महाराजा बीरकिशोर देव के पुत्र हैं। वर्ष 1970 में पिता के निधन के बाद उन्होंने मात्र 17 वर्ष की आयु में गजपति की जिम्मेदारी संभाली। तब से वे परंपरागत रूप से भगवान जगन्नाथ की सेवा और रथ यात्रा से जुड़ी धार्मिक परंपराओं का निर्वहन कर रहे हैं।
भोई राजवंश और गजपति परंपरा
वर्तमान गजपति महाराजा भोई राजवंश के प्रमुख हैं। हालांकि ‘गजपति’ उपाधि का इतिहास पूर्वी गंग वंश से जुड़ा माना जाता है, जिसने 12वीं शताब्दी में भगवान जगन्नाथ मंदिर की परंपराओं को संरक्षण दिया। तभी से पुरी के शासकों को गजपति की उपाधि प्राप्त होती रही है और वे भगवान जगन्नाथ के प्रथम सेवक के रूप में रथ यात्रा की प्रमुख रस्में निभाते आ रहे हैं।
छेरा पहरा की विशेष प्रक्रिया
रथ यात्रा प्रारंभ होने से पहले गजपति महाराजा पारंपरिक राजसी वेशभूषा में रथों के पास पहुंचते हैं। इसके बाद वे सोने की मूठ वाली विशेष झाड़ू से रथों के चारों ओर प्रतीकात्मक सफाई करते हैं। इस दौरान सुगंधित जल और चंदन मिश्रित जल का भी छिड़काव किया जाता है। छेरा पहरा की रस्म पूरी होने के बाद ही भगवान के रथों को खींचने की प्रक्रिया प्रारंभ होती है।
रथ यात्रा का क्रम
रथ यात्रा के दिन भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा अपने-अपने भव्य रथों पर विराजमान होकर श्रीमंदिर से लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित गुंडिचा मंदिर के लिए प्रस्थान करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार गुंडिचा मंदिर भगवान की मौसी का घर माना जाता है। भगवान यहां आठ दिनों तक विराजमान रहते हैं। इसके बाद बहुदा यात्रा के माध्यम से भगवान पुनः श्रीमंदिर लौटते हैं। वापसी के अंतिम दिन नीलाद्रि बीजे की परंपरा निभाई जाती है, जिसमें भगवान जगन्नाथ अपने मूल सिंहासन पर पुनः विराजमान होते हैं और रथ यात्रा का समापन होता है।
रथ यात्रा की विशेष पहचान
पुरी की रथ यात्रा केवल भगवान जगन्नाथ के भव्य रथों के कारण ही नहीं, बल्कि छेरा पहरा जैसी प्राचीन परंपराओं के कारण भी विशेष मानी जाती है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु इस अनूठी रस्म के साक्षी बनने के लिए पुरी पहुंचते हैं। सोने की झाड़ू से मार्ग की प्रतीकात्मक सफाई और गजपति महाराजा द्वारा भगवान की सेवा इस विश्वप्रसिद्ध रथ यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण परंपराओं में गिनी जाती है।