होलिका दहन की तिथि को लेकर इस बार भी लोगों के बीच भ्रम की स्थिति बनी हुई है। कुछ पंचांगों में 2 मार्च को होलिका दहन बताया जा रहा है, तो कुछ में 3 मार्च का उल्लेख है। ऐसे में श्रद्धालु असमंजस में हैं कि आखिर सही तिथि कौन-सी है। दरअसल, होलिका दहन का पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि में मनाया जाता है, लेकिन केवल पूर्णिमा का होना ही पर्याप्त नहीं माना जाता। इस दिन प्रदोष काल और भद्रा की स्थिति भी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, जिसके कारण अलग-अलग पंचांगों में मतभेद दिखाई देते हैं।
होलिका दहन का संबंध धार्मिक आस्था और पौराणिक कथा से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि इस दिन भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने दैत्यराज हिरण्यकश्यप की बहन होलिका के अहंकार का नाश किया था। इसी घटना की स्मृति में होलिका दहन किया जाता है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। इसलिए इसका सही समय पर और विधि-विधान से किया जाना आवश्यक माना जाता है।
भद्रा काल को शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना गया है
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा के दिन प्रदोष काल में किया जाना चाहिए। प्रदोष काल सूर्यास्त के बाद का समय होता है, जो लगभग ढाई घंटे तक रहता है। इसी समय होलिका दहन का विशेष महत्व बताया गया है। लेकिन यदि इस अवधि में भद्रा लगी हो तो स्थिति जटिल हो जाती है। भद्रा काल को शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना गया है। धर्मग्रंथों में उल्लेख है कि भद्रा के दौरान विवाह, गृहप्रवेश, यज्ञ, हवन और अन्य मांगलिक कार्य नहीं करने चाहिए। इसी कारण होलिका दहन भी भद्रा समाप्त होने के बाद ही किया जाता है।
भद्रा वास्तव में पंचांग के करणों में से एक है, जो विशेष समयावधि में लगती है। यदि पूर्णिमा तिथि के दौरान प्रदोष काल में भद्रा उपस्थित हो, तो होलिका दहन उस समय नहीं किया जाता। ऐसी स्थिति में या तो भद्रा समाप्ति के बाद रात में दहन किया जाता है, या फिर यदि भद्रा प्रदोष काल से पहले ही समाप्त हो जाए, तो उसी दिन शुभ मुहूर्त में दहन किया जाता है। यहीं से तिथि को लेकर भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है।
प्रदोष काल में भद्रा हो और दूसरे दिन भद्रा
कुछ पंचांग पूर्णिमा तिथि के आरंभ को आधार बनाकर तिथि घोषित करते हैं, जबकि कुछ प्रदोष काल की उपलब्धता और भद्रा की समाप्ति को अधिक महत्व देते हैं। यदि पूर्णिमा तिथि दो दिनों में पड़ रही हो, तो यह देखा जाता है कि किस दिन प्रदोष काल में पूर्णिमा तिथि विद्यमान है और उस समय भद्रा नहीं है। यदि पहले दिन प्रदोष काल में भद्रा हो और दूसरे दिन भद्रा न हो, तो प्रायः दूसरे दिन होलिका दहन किया जाता है।
धार्मिक दृष्टि से यह भी माना जाता है कि भद्रा पृथ्वी लोक में हो तो कार्य निषिद्ध होता है, लेकिन यदि भद्रा पाताल लोक में हो तो कुछ कार्य किए जा सकते हैं। हालांकि सामान्य परंपरा यही है कि भद्रा समाप्त होने के बाद ही होलिका दहन किया जाए। इसलिए पंडित और ज्योतिषाचार्य स्थानीय समय और स्थान के अनुसार पंचांग देखकर सही मुहूर्त निर्धारित करते हैं। यही कारण है कि अलग-अलग शहरों और राज्यों में होलिका दहन की तिथि या समय में थोड़ा अंतर देखने को मिल सकता है। देश के विभिन्न क्षेत्रों में सूर्योदय-सूर्यास्त का समय भिन्न होता है, जिससे प्रदोष काल की गणना भी अलग-अलग होती है। इसके अलावा पंचांगों की गणना पद्धति में भी अंतर हो सकता है, जिससे तिथियों में मतभेद उत्पन्न होते हैं।
शुभ मुहूर्त
इस वर्ष होलिका दहन 2 मार्च 2026, सोमवार को किया जाएगा। पंचांग के अनुसार होलिका दहन का शुभ मुहूर्त शाम 6 बजकर 22 मिनट से रात 8 बजकर 53 मिनट तक रहेगा। शास्त्रों में वर्णित है कि पूर्णिमा तिथि के प्रदोष काल में ही होलिका दहन करना शुभ और शास्त्रसम्मत माना जाता है, इसलिए यह समय विशेष फलदायी रहेगा। इसके अगले दिन 3 मार्च 2026, मंगलवार को साल का पहला पूर्ण चंद्र ग्रहण लगेगा। वहीं रंगों का पावन पर्व होली 4 मार्च 2026, बुधवार को मनाया जाएगा। इस प्रकार इस बार होली का उत्सव खगोलीय घटनाओं और धार्मिक महत्व के साथ विशेष बन रहा है।
अंततः, होलिका दहन केवल तिथि या मुहूर्त का विषय नहीं है, बल्कि यह आस्था, विश्वास और परंपरा से जुड़ा पर्व है। इसका मूल संदेश बुराई पर अच्छाई की विजय और नकारात्मकता के दहन का है। इसलिए सही समय का ध्यान रखते हुए, श्रद्धा और सकारात्मक भावना के साथ होलिका दहन करना ही इस पर्व का वास्तविक महत्व है।