भारत में दशहरा केवल रावण दहन का पर्व नहीं, बल्कि आस्था, शक्ति, परंपरा और सांस्कृतिक विविधता का उत्सव है। देश के किसी हिस्से में भगवान श्रीराम की विजय की याद में रावण के पुतले जलाए जाते हैं, तो कहीं मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन होता है। किसी शहर में राजसी शोभायात्रा निकलती है, तो कहीं सैकड़ों ग्राम देवताओं का भव्य मिलन देखने को मिलता है।
विजयादशमी के रूप में प्रसिद्ध यह पर्व बुराई पर अच्छाई, अन्याय पर न्याय और अहंकार पर धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है। लेकिन इसकी सबसे खास बात यह है कि भारत के अलग-अलग राज्यों ने इस पर्व को अपनी स्थानीय मान्यताओं और सांस्कृतिक विरासत के अनुसार एक विशिष्ट रूप दिया है।
आइए जानते हैं भारत के पांच राज्यों में दशहरा मनाने की पांच अनोखी परंपराओं के बारे में।
1. उत्तर प्रदेश: रामलीला और रावण दहन से गूंजता विजयादशमी का उत्सव
उत्तर प्रदेश में दशहरे का संबंध मुख्य रूप से रामायण की उस कथा से है, जिसमें भगवान श्रीराम अधर्म के प्रतीक रावण का अंत करते हैं। नवरात्रि के दौरान अनेक शहरों और कस्बों में रामलीला का मंचन होता है। इसमें भगवान राम के जन्म से लेकर सीता हरण, लंका युद्ध और रावण वध तक की घटनाओं को नाटकीय रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
विजयादशमी के दिन रामलीला का समापन रावण दहन के साथ होता है। कई स्थानों पर रावण के साथ मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले भी जलाए जाते हैं। मैदानों में जुटे लोग भगवान श्रीराम के जयकारे लगाते हैं और इस विजय को धर्म की स्थापना के रूप में देखते हैं।
वाराणसी, अयोध्या, लखनऊ और रामनगर की रामलीला जैसी परंपराएं उत्तर प्रदेश की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। विशेष रूप से रामनगर की रामलीला अपनी पारंपरिक शैली और विस्तृत मंचन के लिए प्रसिद्ध है।
धार्मिक महत्व: यह परंपरा याद दिलाती है कि शक्ति और ज्ञान होने के बावजूद यदि व्यक्ति अहंकार और अधर्म का रास्ता चुनता है, तो उसका पतन निश्चित है।
2. कर्नाटक: मैसूर दशहरा में दिखती है राजसी परंपरा
कर्नाटक के मैसूर में दशहरा को ‘मैसूर दशहरा’ या ‘मैसूरु दसरा’ के नाम से जाना जाता है। यह उत्सव अपनी भव्यता, राजसी परंपराओं और मां चामुंडेश्वरी की आराधना के लिए प्रसिद्ध है। यहां दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि ऐतिहासिक विरासत और लोक संस्कृति का बड़ा उत्सव भी है।
इस पर्व के दौरान मैसूर महल को रोशनी से सजाया जाता है। सांस्कृतिक कार्यक्रम, संगीत, पारंपरिक प्रस्तुतियां और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान उत्सव का हिस्सा बनते हैं।
विजयादशमी पर निकलने वाली जंबू सवारी यहां के उत्सव का प्रमुख आकर्षण है। इस भव्य शोभायात्रा में सजे हुए हाथी पर स्वर्ण हौदे में मां चामुंडेश्वरी की प्रतिमा विराजमान होती है। शोभायात्रा को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं।
मैसूर दशहरा की धार्मिक मान्यता मां चामुंडेश्वरी द्वारा महिषासुर पर विजय से जुड़ी है। इसी कथा से मैसूर क्षेत्र की पहचान भी जुड़ती है।
धार्मिक महत्व: मैसूर दशहरा शक्ति की उपासना के साथ-साथ अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने का संदेश देता है।
3. पश्चिम बंगाल: मां दुर्गा की विदाई और सिंदूर खेला
पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा वर्ष के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सवों में से एक है। यहां दशहरे से जुड़ी विजयादशमी की परंपरा भगवान श्रीराम की विजय के साथ-साथ मां दुर्गा द्वारा महिषासुर के वध की स्मृति से भी जुड़ी है।
नवरात्रि के दिनों में कोलकाता और राज्य के अन्य क्षेत्रों में भव्य पंडाल सजाए जाते हैं। इन पंडालों में मां दुर्गा की प्रतिमा के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। ढाक की गूंज, धुनुची नृत्य और पारंपरिक पूजा इस उत्सव को विशेष रंग देते हैं।
विजयादशमी के अवसर पर कई पूजा पंडालों में सिंदूर खेला की परंपरा निभाई जाती है। इसमें विवाहित महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं और एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। इसके बाद मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है। इस अवसर को ‘बिजोया दशमी’ भी कहा जाता है।
मां की विदाई के समय भक्त भावुक हो उठते हैं। यह विदाई केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मां के मायके आने और फिर अपने धाम लौटने की भावनात्मक कल्पना से भी जुड़ी है।
धार्मिक महत्व: यह उत्सव नारी शक्ति, मातृत्व, भक्ति और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।
4. हिमाचल प्रदेश: कुल्लू दशहरा में होता है देवी-देवताओं का अनोखा मिलन
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू का दशहरा अपनी अनूठी परंपरा के कारण देशभर में प्रसिद्ध है। भारत के अनेक हिस्सों में जब विजयादशमी पर दशहरा उत्सव समाप्त होता है, तब कुल्लू में इसका मुख्य आयोजन आरंभ होता है।
यहां के उत्सव का केंद्र भगवान रघुनाथ हैं। कुल्लू घाटी और आसपास के क्षेत्रों के अनेक ग्राम देवताओं की पालकियां सजाकर धालपुर मैदान में लाई जाती हैं। पारंपरिक वाद्ययंत्रों, लोक संगीत और धार्मिक जयकारों के बीच देवताओं का आगमन उत्सव को विशेष रूप देता है।
कुल्लू दशहरा में स्थानीय देव परंपराओं और सामुदायिक सहभागिता का महत्वपूर्ण स्थान है। विभिन्न गांवों के लोग अपने आराध्य देवताओं के साथ इस आयोजन में भाग लेते हैं। यह परंपरा क्षेत्र के धार्मिक जीवन और सांस्कृतिक पहचान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाती है।
यहां दशहरे का आकर्षण केवल किसी पुतले का दहन नहीं, बल्कि देवताओं का एकत्र होना और सामूहिक आस्था का उत्सव है।
धार्मिक महत्व: कुल्लू दशहरा सिखाता है कि आस्था केवल व्यक्तिगत पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि समुदाय को जोड़ने वाली सांस्कृतिक शक्ति भी है।
5. छत्तीसगढ़: बस्तर दशहरा, जहां नहीं जलाया जाता रावण का पुतला
छत्तीसगढ़ का बस्तर दशहरा भारत के सबसे विशिष्ट दशहरा उत्सवों में गिना जाता है। इसकी सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि यहां सामान्य दशहरा परंपरा की तरह रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। इस उत्सव का केंद्र मां दंतेश्वरी की आराधना, स्थानीय देवी-देवताओं की परंपराएं और आदिवासी संस्कृति है।
बस्तर दशहरा की परंपरा लगभग छह सौ वर्ष पुरानी मानी जाती है। इसकी शुरुआत से जुड़ी ऐतिहासिक मान्यताएं बस्तर के राजवंश और मां दंतेश्वरी की भक्ति से संबंध रखती हैं।
यह उत्सव कई सप्ताह तक चलने वाले विभिन्न अनुष्ठानों का समूह है। इसमें पारंपरिक रथ निर्माण, देवी-देवताओं का आगमन, धार्मिक आयोजन और स्थानीय समुदायों की सहभागिता शामिल होती है। बस्तर के अलग-अलग क्षेत्रों की सांस्कृतिक परंपराएं इस उत्सव में एक साथ दिखाई देती हैं।
बस्तर दशहरा यह समझने का अवसर देता है कि भारत में एक ही पर्व का अर्थ हर क्षेत्र में एक जैसा होना जरूरी नहीं। यहां दशहरा स्थानीय आस्था, देवी उपासना और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का प्रतीक है।
धार्मिक महत्व: यह पर्व मां दंतेश्वरी के प्रति श्रद्धा और बस्तर की जीवंत लोक-सांस्कृतिक परंपराओं को सम्मान देने का संदेश देता है।
दशहरा की पांच परंपराएं, लेकिन संदेश एक
उत्तर प्रदेश की रामलीला और रावण दहन, कर्नाटक की जंबू सवारी, पश्चिम बंगाल की मां दुर्गा की विदाई, हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में देवी-देवताओं का मिलन और छत्तीसगढ़ के बस्तर की विशिष्ट परंपराएं—ये सभी दशहरे के अलग-अलग रंग हैं।
इन परंपराओं में पूजा-पद्धति, आयोजन और धार्मिक कथाओं की अभिव्यक्ति भले ही अलग हो, लेकिन इनके केंद्र में धर्म, आस्था, शक्ति और सदाचार का महत्व बना रहता है।
दशहरा हमें यह भी याद दिलाता है कि बुराई पर विजय केवल किसी पौराणिक युद्ध की कहानी नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, लोभ और अन्याय को पहचानकर उनसे ऊपर उठने की प्रेरणा है।
एक देश, अनेक रंग—और हर रंग में छिपा है अच्छाई की विजय का संदेश।