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दिव्य सुधा > अन्य > खरमास: अशुभ नहीं, बल्कि साधना और आत्मशुद्धि का पावन काल
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खरमास: अशुभ नहीं, बल्कि साधना और आत्मशुद्धि का पावन काल

दिव्यसुधा
Last updated: December 22, 2025 4:55 pm
दिव्यसुधा
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खरमास में सूर्य साधना और आत्मशुद्धि का आध्यात्मिक महत्व
खरमास अशुभ नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, साधना और सूर्य उपासना का श्रेष्ठ अवसर है।
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खरमास का नाम सुनते ही आमतौर पर लोगों के मन में यह धारणा बन जाती है कि यह समय अशुभ होता है और इसमें कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए। वास्तव में शास्त्रों में खरमास के दौरान विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों को वर्जित माना गया है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि यह काल नकारात्मक या अशुभ है। शास्त्रों के अनुसार खरमास बाहरी कर्मकांडों से अधिक आंतरिक साधना का समय है। इस अवधि में पूजा, जप, तप और दान को अत्यंत फलदायी बताया गया है। यह समय आत्मशुद्धि, मन की स्थिरता और पुण्य संचय के लिए विशेष रूप से श्रेष्ठ माना गया है।

14 जनवरी को होगा खरमास का समापन
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जब सूर्यदेव धनु राशि में प्रवेश करते हैं, तब से लगभग एक मास की अवधि को खरमास कहा जाता है। यह काल सूर्य की आध्यात्मिक गति का प्रतीक माना जाता है, जिसमें आत्मचिंतन और धर्म की ओर प्रवृत्ति बढ़ती है। इसी कारण इस समय शुभ और मांगलिक कार्यों से विराम लिया जाता है। इस वर्ष खरमास की शुरुआत 16 दिसंबर 2025 से हो चुकी है और इसका समापन 14 जनवरी 2026 को सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के साथ होगा। मकर संक्रांति के दिन से फिर से सभी शुभ कार्य आरंभ हो जाते हैं।

खरमास में साधना से आते हैं जीवन में बड़े बदलाव
ज्योतिष शास्त्र में सूर्यदेव को आत्मविश्वास, तेज, मान-सम्मान और यश का कारक माना गया है। यदि किसी व्यक्ति के जीवन में बार-बार अपमान, असफलता या आत्मबल की कमी महसूस हो रही हो, तो इसे कमजोर सूर्य का संकेत माना जाता है। ऐसे में खरमास के दौरान की गई सूर्य साधना जीवन में गहरा और सकारात्मक परिवर्तन ला सकती है। यह साधना न केवल व्यक्ति के आत्मविश्वास को मजबूत बनाती है, बल्कि समाज में उसकी प्रतिष्ठा और पहचान भी बढ़ाती है। शास्त्रों के अनुसार इस काल में किया गया जप-तप और पूजा पुराने पापों के क्षय में सहायक होती है।

खरमास में प्रतिदिन करने योग्य पुण्य कर्म
खरमास के दौरान प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के बाद सूर्यदेव को अर्घ्य देना अत्यंत शुभ माना गया है। अर्घ्य देते समय सूर्यदेव का ध्यान करना और उनके नामों का स्मरण करने से मन शांत होता है और दिन सकारात्मक ऊर्जा के साथ आरंभ होता है। इस काल में दान को सबसे श्रेष्ठ कर्म बताया गया है। धर्मशास्त्रों और लाल किताब के अनुसार खरमास में किया गया दान दरिद्रता का नाश करता है और पितृ दोष व ग्रह दोष में भी राहत देता है। इस दौरान अन्न, तिल, गुड़, वस्त्र, कंबल या जरूरतमंदों को दान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।

खरमास में सूर्य चालीसा पाठ का विशेष महत्व
खरमास के दौरान प्रतिदिन सूर्य चालीसा का पाठ करना अत्यंत फलदायी माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस काल में सूर्यदेव की आराधना करने से वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं और साधक पर अपनी विशेष कृपा बरसाते हैं। सूर्य चालीसा के पाठ से व्यक्ति का आत्मविश्वास बढ़ता है और समाज में उसका मान-सम्मान बढ़ने लगता है। ज्योतिषियों के अनुसार इससे कुंडली में सूर्य की स्थिति मजबूत होती है, जिससे नेतृत्व क्षमता का विकास होता है, उच्च पद की प्राप्ति के योग बनते हैं और पिता के साथ संबंधों में भी मधुरता आती है।

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