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दिव्य सुधा > व्रत और त्योहार > बगलामुखी जयंती 2026: सही तिथि, मुहूर्त और प्राकट्य की पावन कथा
व्रत और त्योहार

बगलामुखी जयंती 2026: सही तिथि, मुहूर्त और प्राकट्य की पावन कथा

दिव्यसुधा
Last updated: April 23, 2026 1:43 pm
दिव्यसुधा
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मां बगलामुखी जयंती 2026 पूजा और शुभ मुहूर्त
मां बगलामुखी जयंती 2026: जानें तिथि, मुहूर्त और पूजा का महत्व
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सनातन परंपरा में बगलामुखी को दस महाविद्याओं में आठवीं देवी के रूप में विशेष स्थान प्राप्त है। उन्हें ‘स्तंभन शक्ति’ की अधिष्ठात्री माना जाता है, जो शत्रुओं की वाणी, बुद्धि और शक्ति को निष्क्रिय करने की सामर्थ्य रखती हैं। वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मां बगलामुखी का प्राकट्य हुआ था, इसलिए इस दिन उनका जन्मोत्सव बड़े श्रद्धा और विधि-विधान से मनाया जाता है।

बगलामुखी जयंती 2026 की सही तिथि
पंचांग के अनुसार, इस वर्ष अष्टमी तिथि 23 अप्रैल 2026 को रात 08:49 बजे से प्रारंभ होकर 24 अप्रैल 2026 को शाम 07:21 बजे तक रहेगी। उदयातिथि के आधार पर बगलामुखी जयंती 24 अप्रैल, शुक्रवार को मनाई जाएगी। इस दिन पुष्य नक्षत्र और रवि योग का विशेष संयोग बन रहा है, जो पूजा और साधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।

शुभ मुहूर्त का महत्व
24 अप्रैल को ब्रह्म मुहूर्त सुबह 04:19 से 05:03 बजे तक रहेगा, जो साधना और जप के लिए सर्वोत्तम समय है। अभिजीत मुहूर्त 11:53 बजे से 12:46 बजे तक रहेगा, जो किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत के लिए उत्तम माना जाता है। वहीं मंत्र सिद्धि और गहन साधना के लिए निशिता मुहूर्त 24 अप्रैल की रात 11:57 बजे से 25 अप्रैल को 12:41 बजे तक रहेगा। पुष्य नक्षत्र सुबह से रात 08:14 बजे तक रहेगा और इसके बाद रवि योग प्रारंभ होकर अगले दिन प्रातः 05:46 बजे तक चलेगा।

मां बगलामुखी के प्राकट्य की कथा
मां बगलामुखी के प्राकट्य से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार, एक बार ब्रह्मा जी के एक महत्वपूर्ण ग्रंथ को एक राक्षस चुरा कर पाताल लोक में ले गया। तब ब्रह्मा जी ने देवी की कठोर साधना की, जिससे मां बगलामुखी प्रकट हुईं। उन्होंने बगुले का रूप धारण कर उस राक्षस का वध किया और ग्रंथ को वापस लौटा दिया।

दूसरी कथा के अनुसार, सतयुग में एक भयंकर तूफान ने पूरी पृथ्वी को संकट में डाल दिया। तब भगवान Vishnu ने भगवान शिव के निर्देश पर आदिशक्ति की तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर मां बगलामुखी सौराष्ट्र की हरिद्रा झील से प्रकट हुईं और उन्होंने उस विनाशकारी संकट को समाप्त किया।

देवी के अन्य नाम और स्वरूप
मां बगलामुखी को ‘पीतांबरा’ भी कहा जाता है, क्योंकि उन्हें पीला रंग अत्यंत प्रिय है। उनका स्वरूप पीत वर्ण का है और वे ब्रह्मास्त्र रूपिणी के नाम से भी जानी जाती हैं। उनका यह रूप शक्ति, साहस और दैवी संरक्षण का प्रतीक है।

प्रसिद्ध मंदिर और आस्था का केंद्र
मध्य प्रदेश के दतिया स्थित पीतांबरा पीठ, नलखेड़ा का प्राचीन मंदिर और हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले का बनखंडी मंदिर मां बगलामुखी के प्रमुख तीर्थ स्थल हैं। इन स्थानों पर दूर-दूर से भक्त आकर विशेष पूजा, हवन और साधना करते हैं।

पूजा का महत्व और लाभ
मां बगलामुखी की उपासना से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है और जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। मान्यता है कि उनकी कृपा से कोर्ट-कचहरी के मामलों में सफलता मिलती है और व्यक्ति को मानसिक शांति प्राप्त होती है। जो साधक सच्चे मन से मां की आराधना करता है, उसे साहस, शक्ति और सफलता का आशीर्वाद मिलता है।

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