सनातन धर्म में प्रत्येक एकादशी तिथि भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित मानी जाती है। इनमें आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखने, भगवान विष्णु की पूजा करने और योगिनी एकादशी की कथा सुनने से व्यक्ति के पापों का नाश होता है तथा सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस व्रत का पुण्य हजारों ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान फलदायी माना गया है।
योगिनी एकादशी का महत्व
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार योगिनी एकादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ अवसर है। मान्यता है कि इस दिन उपवास, पूजा, भजन और दान-पुण्य करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। भगवान श्रीहरि की कृपा से रोग, दुःख और कष्ट दूर होते हैं तथा मन में शांति और संतोष का संचार होता है।
योगिनी एकादशी व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने इस एकादशी का महत्व धर्मराज युधिष्ठिर को बताया था। प्राचीन समय में अलकापुरी नामक दिव्य नगरी में धन के देवता कुबेर का राज्य था। कुबेर भगवान शिव के परम भक्त थे और उनकी प्रतिदिन विशेष पूजा होती थी। उनके लिए हेम नाम का एक माली मानसरोवर से सुंदर पुष्प लाकर अर्पित करता था। हेम अपनी पत्नी विशालाक्षी से अत्यंत प्रेम करता था। एक दिन वह फूल तो ले आया, लेकिन पत्नी के प्रेम में इतना मग्न हो गया कि समय पर भगवान शिव की पूजा के लिए फूल नहीं पहुंचा सका। इससे क्रोधित होकर कुबेर ने उसे श्राप दिया कि वह अपनी पत्नी से वियोग का दुःख सहेगा और पृथ्वी पर कोढ़ी बनकर कष्टमय जीवन बिताएगा। श्राप के प्रभाव से हेम तुरंत पृथ्वी पर आ गिरा। उसका शरीर कोढ़ से ग्रस्त हो गया और पत्नी भी उससे बिछड़ गई। वर्षों तक कष्ट सहने के बाद एक दिन वह महर्षि मार्कण्डेय के आश्रम पहुंचा। ऋषि ने उसकी पीड़ा का कारण पूछा तो हेम ने अपनी पूरी कथा सुनाई। महर्षि मार्कण्डेय ने उसे श्रद्धा और नियमपूर्वक योगिनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। हेम ने पूरे विधि-विधान से व्रत किया। भगवान विष्णु की कृपा से उसका श्राप समाप्त हो गया, उसका शरीर पुनः स्वस्थ हो गया और वह अपनी पत्नी के साथ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगा। इसी कारण योगिनी एकादशी को पापों से मुक्ति, रोगों के नाश और सुख-समृद्धि प्रदान करने वाला अत्यंत पुण्यदायी व्रत माना गया है।
योगिनी एकादशी व्रत की पूजा विधि
योगिनी एकादशी के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। पूजा स्थल को स्वच्छ करके कलश स्थापित करें तथा भगवान श्रीहरि विष्णु की प्रतिमा या चित्र विराजमान करें। इसके बाद उन्हें पीले पुष्प, तुलसी दल, फल, धूप और दीप अर्पित करें। पूजा के दौरान विष्णु सहस्रनाम, विष्णु चालीसा या ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जप करना अत्यंत शुभ माना जाता है। भगवान को गुड़ और चने का भोग अर्पित करें तथा अंत में आरती कर योगिनी एकादशी की कथा अवश्य सुनें या पढ़ें। श्रद्धा और भक्ति से की गई यह पूजा भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष कृपा प्रदान करने वाली मानी जाती है।
योगिनी एकादशी की कथा हमें यह शिक्षा देती है कि कर्तव्य के प्रति लापरवाही और अहंकार व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में डाल सकते हैं, लेकिन सच्चा पश्चाताप, भक्ति और भगवान के प्रति समर्पण जीवन की दिशा बदल सकते हैं। यह व्रत केवल इच्छाओं की पूर्ति का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, अनुशासन और भगवान श्रीहरि की शरण में जाने का पावन अवसर भी है।