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दिव्य सुधा > सनातन धर्म > भगवान > बरसात के देवता इंद्र क्यों कहे जाते हैं? जानें पौराणिक कथा और महत्व
भगवान

बरसात के देवता इंद्र क्यों कहे जाते हैं? जानें पौराणिक कथा और महत्व

दिव्यसुधा
Last updated: November 3, 2025 3:06 pm
दिव्यसुधा
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इंद्र देव वर्षा के देवता के रूप में वज्र धारण किए हुए, ऐरावत हाथी पर सवार
वज्र धारण किए इंद्र देव, जो वर्षा के माध्यम से पृथ्वी पर जीवन का संचार करते हैं।
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हिंदू धर्म में इंद्र देव का विशेष स्थान है। उन्हें देवताओं का राजा कहा जाता है और वे स्वर्ग लोक के शासक हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान इंद्र को ‘बरसात का देवता’ क्यों कहा जाता है? उनके नाम से जुड़ी कई पौराणिक और वैदिक कथाएं हैं जो यह बताती हैं कि वर्षा और जल की व्यवस्था के देवता इंद्र क्यों बने।


इंद्र देव का स्वरूप और महत्व

इंद्र देव को वज्र और वृष्टि का स्वामी कहा गया है। वे स्वर्गलोक के राजा हैं और उनका वाहन ऐरावत हाथी है। उनके पास वज्र नामक अस्त्र है, जो देवताओं में सबसे शक्तिशाली माना जाता है। कहा जाता है कि जब इंद्र वज्र से आकाश में गर्जना करते हैं, तब मेघ बरसते हैं और पृथ्वी पर जीवन का संचार होता है। वेदों में भी इंद्र का विशेष स्थान बताया गया है। ऋग्वेद में उनके लगभग 250 सूक्त हैं, जिनमें उन्हें वज्रधारी, जल का रक्षक और वर्षा कराने वाले देवता के रूप में वर्णित किया गया है। यही कारण है कि वे ‘मेघों के स्वामी’ और ‘वर्षा दाता’ कहलाते हैं।


वृत्रासुर वध की कथा — वर्षा के देवता बनने की वजह

पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय दैत्य वृत्रासुर ने कठोर तपस्या करके यह वरदान प्राप्त कर लिया कि उसे कोई देवता मार नहीं सकेगा। वरदान पाकर उसने अत्याचार शुरू कर दिए। उसने जल और मेघों को कैद कर लिया, जिससे पृथ्वी पर सूखा पड़ गया और सब जीव-जंतु पीड़ित होने लगे। देवता असहाय होकर भगवान विष्णु के पास गए। विष्णु जी ने बताया कि वृत्रासुर का वध केवल ऋषि दधीचि की अस्थियों से बने वज्र से ही संभव है। ऋषि दधीचि ने निःस्वार्थ भाव से अपनी देह त्याग दी और उनकी अस्थियों से वज्र बनाया गया। इंद्र देव ने उसी वज्र से वृत्रासुर का वध किया। जैसे ही उसका शरीर धरती पर गिरा, जल और मेघ मुक्त हो गए। वर्षा होने लगी और सूखी धरती पर हरियाली लौट आई। इसी घटना के बाद से इंद्र को वर्षा का देवता कहा जाने लगा — क्योंकि उन्हीं के माध्यम से वर्षा का मार्ग खुला।


गोवर्धन लीला — जब श्रीकृष्ण ने दी इंद्र को शिक्षा

भागवत पुराण में भगवान श्रीकृष्ण और इंद्र से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा आती है। गोकुल के लोग हर वर्ष इंद्र देव की पूजा करते थे ताकि बारिश हो सके। परंतु भगवान कृष्ण ने उन्हें समझाया कि असली पालनकर्ता इंद्र नहीं, बल्कि प्रकृति और पर्वत हैं — क्योंकि वही हमें भोजन, जल और संसाधन देते हैं। कृष्ण की बात मानकर लोगों ने गोवर्धन पर्वत की पूजा की। इससे इंद्र क्रोधित हो गए और उन्होंने गोकुल पर मूसलधार बारिश कर दी। तब भगवान कृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया और सभी ग्रामीणों को उसकी छाया में सुरक्षित रखा। कृष्ण की इस लीला से इंद्र को अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्होंने श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी और समझ गए कि वर्षा का उद्देश्य केवल शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि जीवन को बनाए रखना है। यह कथा बताती है कि इंद्र वर्षा के देवता हैं, परंतु उनका कार्य प्रकृति के संतुलन को बनाए रखना है।


वेदों और पुराणों में इंद्र का उल्लेख

ऋग्वेद में इंद्र को सबसे महान योद्धा और शक्तिशाली देवता कहा गया है। उन्हें “मेघों के अधिपति” और “वज्रधारी देव” के रूप में वर्णित किया गया है, जो आकाश में वज्र चलाकर वर्षा करते हैं। अथर्ववेद और यजुर्वेद में भी इंद्र को जल का नियंता और वृष्टि का स्रोत बताया गया है।

महाभारत और रामायण जैसे ग्रंथों में भी उनका उल्लेख मिलता है। रामायण में जब इंद्रदेव अपने पुत्र जयंत को स्वर्ग भेजते हैं, तब यह स्पष्ट होता है कि वे देवताओं में सर्वोच्च स्थान रखते हैं। वहीं भागवत पुराण में गोवर्धन लीला के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि इंद्र का कार्य वर्षा कर पृथ्वी को जीवन देना है, न कि मनुष्यों पर क्रोध करना।

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