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दिव्य सुधा > सनातन धर्म > मंदिर > वृंदावन का गोपेश्वर महादेव: जब शिव बने गोपी और प्रेम ने लिया दिव्य रूप
मंदिर

वृंदावन का गोपेश्वर महादेव: जब शिव बने गोपी और प्रेम ने लिया दिव्य रूप

दिव्यसुधा
Last updated: February 18, 2026 3:06 pm
दिव्यसुधा
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वृंदावन के गोपेश्वर महादेव मंदिर में गोपी रूप में सजे शिवलिंग का दिव्य दर्शन
जब शिव बने गोपी – वृंदावन के गोपेश्वर महादेव का अद्भुत रहस्य
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ब्रजभूमि का कण-कण श्रीकृष्ण की लीलाओं से आलोकित है। इसी पावन धरा पर स्थित है गोपेश्वर महादेव मंदिर, जो भक्ति, प्रेम और पूर्ण समर्पण का अद्भुत प्रतीक माना जाता है। यह संभवतः एकमात्र ऐसा शिव मंदिर है, जहां भोलेनाथ का श्रृंगार बिंदी, सिंदूर, चूड़ी और सोलह श्रृंगार के आभूषणों से किया जाता है। यहां महादेव केवल योगी या संहारकर्ता रूप में नहीं, बल्कि सखी भाव में विराजमान हैं।

क्यों धारण किया शिव ने गोपी रूप?
पौराणिक कथा के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात्रि में श्रीकृष्ण वृंदावन में राधारानी और गोपियों के साथ महारास रचाते थे। उस अलौकिक रास का आनंद देवताओं तक को आकर्षित करता था। जब भगवान शिव ने इस दिव्य लीला का श्रवण किया, तो उनके हृदय में भी उस रस में सम्मिलित होने की तीव्र इच्छा जागी। वे वृंदावन पहुंचे, परंतु महारास में केवल गोपियों को ही प्रवेश की अनुमति थी। पुरुष रूप में प्रवेश संभव नहीं था।

कथा के अनुसार, वृंदा देवी ने उन्हें रोक दिया। तब भगवान शिव ने अहंकार और संकोच त्यागकर श्रीकृष्ण भक्ति में स्वयं को समर्पित कर दिया। उन्होंने पवित्र यमुना में स्नान किया और दिव्य गोपी रूप धारण किया। जब वे महारास में पहुंचे, तो श्रीकृष्ण ने उनके सखी भाव को तुरंत पहचान लिया। प्रसन्न होकर उन्होंने शिव को “गोपेश्वर” नाम दिया अर्थात गोपियों के ईश्वर। उसी क्षण से शिव इस पावन स्थल पर गोपी स्वरूप में पूजित होने लगे।

गोपी भाव में होता है अद्भुत श्रृंगार
इस मंदिर की सबसे विशेष परंपरा है शिवलिंग का गोपी रूप में श्रृंगार। यहां प्रतिदिन बिंदी, सिंदूर, चूड़ियां, फूलों की मालाएं और वस्त्रों से सजावट की जाती है। शरद पूर्णिमा के दिन विशेष रूप से सोलह श्रृंगार किया जाता है। यह दृश्य भक्तों को केवल आश्चर्यचकित ही नहीं करता, बल्कि उन्हें सखी भाव की अनुभूति कराता है जहां भक्त और भगवान के बीच कोई भेद नहीं रहता, केवल प्रेम का प्रवाह होता है।

यह परंपरा दर्शाती है कि सच्ची भक्ति में अहंकार का स्थान नहीं होता। शिव, जो स्वयं देवाधिदेव हैं, उन्होंने भी कृष्ण प्रेम के लिए गोपी रूप धारण किया। यह संदेश देता है कि ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग विनम्रता और प्रेम से होकर ही जाता है।

ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व
गोपेश्वर महादेव मंदिर यमुना तट के समीप वंशीवट क्षेत्र में स्थित है और इसे वृंदावन के प्राचीन मंदिरों में गिना जाता है। मान्यता है कि इस शिवलिंग की स्थापना भगवान कृष्ण के वंशज व्रजनाभ ने की थी। यह स्थान केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुभूति का केंद्र है। यहां का शांत वातावरण, प्राचीन स्थापत्य और सतत प्रवाहित भक्ति भाव मन को भीतर तक स्पर्श करता है।

मंदिर पुरुष और स्त्री शक्ति के दिव्य मिलन का भी प्रतीक माना जाता है। शिव का गोपी रूप इस सत्य को प्रकट करता है कि आत्मा का कोई लिंग नहीं होता; वह केवल प्रेम का माध्यम है।

शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व
शरद पूर्णिमा के दिन यहां विशेष पूजा-अर्चना और उत्सव का आयोजन होता है। हजारों श्रद्धालु उस दिव्य रात्रि की स्मृति में दर्शन करने आते हैं। माना जाता है कि इस दिन यहां उपस्थित होकर रास लीला का स्मरण करने से मन की अशांति दूर होती है और हृदय में भक्ति का दीप प्रज्वलित होता है।

कैसे पहुंचे ?
वृंदावन, उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद में स्थित है, जो मथुरा से लगभग 12–13 किलोमीटर दूर है। निकटतम रेलवे स्टेशन मथुरा जंक्शन है और निकटतम हवाई अड्डा दिल्ली का इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है। सड़क मार्ग से भी वृंदावन आसानी से पहुँचा जा सकता है।

गोपेश्वर महादेव मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि यह प्रेम, समर्पण और सखी भाव की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है। यहां शिव हमें यह सिखाते हैं कि ईश्वर के प्रति प्रेम इतना निर्मल हो कि उसमें अहंकार का अंश भी न बचे। जब भक्त स्वयं को पूर्णतः समर्पित कर देता है, तभी वह दिव्य रस का अनुभव कर पाता है। वृंदावन का यह अद्भुत मंदिर उसी शाश्वत प्रेम का जीवंत प्रतीक है।

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