लंका-विजय और अयोध्या-राज्याभिषेक के पश्चात श्रीराम ने दीर्घकाल तक आदर्श शासन किया, जिसे “रामराज्य” कहा गया। जब अवतार-कार्य पूर्ण हुआ, तब देव-प्रेरणा से उन्होंने अपने दिव्य धाम वैकुण्ठ लौटने का निश्चय किया।
कालदेव का आगमन और शर्त
कालदेव ब्राह्मण-वेश में आए और श्रीराम से एकांत वार्ता की इच्छा प्रकट की। शर्त यह थी कि वार्ता के बीच कोई भी प्रवेश करेगा तो उसे मृत्युदंड मिलेगा। श्रीराम ने द्वार-रक्षा का दायित्व लक्ष्मण को सौंपा।
ऋषि दुर्वासा और लक्ष्मण का धर्मसंकट
उसी समय दुर्वासा वहाँ पधारे और तत्काल मिलन की जिद की। लक्ष्मण धर्मसंकट में पड़ गए—ऋषि को रोकते तो उनके क्रोध से अयोध्या संकट में पड़ सकती थी, और भीतर जाने देते तो श्रीराम की आज्ञा भंग होती। अंततः उन्होंने राज्य-प्रजा की रक्षा हेतु भीतर जाकर सूचना दी और स्वयं दंड के भागी बने। मर्यादा-पालन के लिए श्रीराम ने अत्यंत विषाद के साथ लक्ष्मण का त्याग किया। लक्ष्मण सरयू तट पर गए और योगबल से देह त्यागकर अपने दिव्य स्वरूप में लीन हो गए। यह घटना पृथ्वी-लीला के समापन का संकेत बनी।
हनुमान को चिरंजीविता का वरदान

जब श्रीराम सरयू की ओर प्रस्थान कर रहे थे, तब अयोध्या की प्रजा, मंत्री और भाई उनके साथ थे। हनुमान भी उपस्थित थे और प्रभु-वियोग की कल्पना से व्याकुल थे। श्रीराम ने हनुमान को स्नेहपूर्वक समझाया कि उनका कार्य अभी शेष है। उन्होंने आदेश दिया कि जब तक पृथ्वी पर रामनाम, रामकथा और कीर्तन होता रहेगा, तब तक वे जीवित रहकर भक्तों की रक्षा करें। इस प्रकार उन्हें चिरंजीवी (अजर-अमर) होने का आशीर्वाद मिला।
रामचरितमानस और उत्तरकाण्ड का संकेत
रामचरितमानस (उत्तरकाण्ड) में संकेत है कि जहाँ-जहाँ रामनाम का स्मरण होगा, वहाँ हनुमान की उपस्थिति रहेगी। इसी प्रकार वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड में श्रीराम के सरयू-प्रवेश और दिव्य स्वरूप धारण कर वैकुण्ठ गमन का वर्णन है, तथा कुछ विशिष्ट भक्तों को पृथ्वी पर रहने का आदेश मिलने का उल्लेख मिलता है—हनुमान उनमें प्रमुख हैं।
भक्ति-परंपरा की मान्यता
भक्ति-परंपरा में यह विश्वास प्रचलित है कि हनुमान जी आज भी जीवित हैं और जहाँ भी रामायण-पाठ या कीर्तन होता है, वहाँ वे अदृश्य रूप से उपस्थित रहते हैं। इसी कारण रामकथा से पूर्व हनुमानजी का आह्वान किया जाता है।
श्रीराम के सरयू-प्रवेश के समय हनुमान जी अयोध्या में उपस्थित थे, पर वे प्रभु के साथ सरयू में नहीं गए। श्रीराम की आज्ञा से वे पृथ्वी पर ही रहे ताकि युग-युगांतर तक रामनाम की सेवा और भक्तों की रक्षा कर सकें इसीलिए उन्हें “चिरंजीवी” कहा जाता है।