सूतजी ने कहा: हे ऋषियों! अब मैं एक और कथा सुनाता हूँ, कृपया ध्यान से सुनिए। एक बार तुंगध्वज नाम का एक राजा था जो प्रजा की सेवा में लगा रहता था। लेकिन उसने भगवान सत्यनारायण का प्रसाद नहीं स्वीकार कर बहुत बड़ा अपमान किया। एक दिन वह जंगल में शिकार करने गया। वहां एक बड़े पेड़ के नीचे उसने कुछ ग्वालों को भगवान सत्यनारायण की पूजा करते देखा। राजा घमंड में आकर पूजा स्थल पर नहीं गया और ना ही भगवान को प्रणाम किया। ग्वालों ने उसे प्रसाद दिया लेकिन राजा ने प्रसाद को नहीं खाया और वहीं छोड़कर अपने नगर लौट गया।
जब राजा तुंगध्वज अपने नगर पहुँचा, तो उसने देखा कि वहां सब कुछ नष्ट हो चुका था — धन, संपत्ति और शांति सब समाप्त हो गए थे। यह देखकर वह तुरंत समझ गया कि यह सब भगवान सत्यनारायण की अवहेलना करने का परिणाम है। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और वह दोबारा ग्वालों के पास लौटा। वहां जाकर उसने विधिपूर्वक भगवान सत्यनारायण की पूजा की और श्रद्धा से प्रसाद ग्रहण किया। भगवान की कृपा से उसका सब कुछ पहले जैसा हो गया — नगर फिर से समृद्ध हो गया और सुख-शांति लौट आई। राजा ने लंबे समय तक सुखपूर्वक राज्य किया और अंत में स्वर्गलोक को प्राप्त हुआ।
जो भी व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति से इस परम दुर्लभ सत्यनारायण व्रत को करता है, उसे भगवान सत्यनारायण की कृपा से सभी सुख-सुविधाएं प्राप्त होती हैं। इस व्रत के प्रभाव से निर्धन व्यक्ति भी धन-धान्य से भर जाता है। उसका जीवन भयमुक्त और सुखमय हो जाता है। जो संतान की इच्छा रखते हैं, उन्हें संतान सुख प्राप्त होता है। मनुष्य के सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन के अंत में वह बैकुंठधाम को प्राप्त करता है, जहाँ शाश्वत शांति और मोक्ष मिलता है।
वृद्ध शतानन्द ब्राह्मण ने अगले जन्म में सुदामा के रूप में जन्म लिया और भगवान की कृपा से मोक्ष प्राप्त किया। लकड़हारा अगले जन्म में निषाद बना और भगवान की भक्ति करके मोक्ष को प्राप्त हुआ। उल्कामुख ब्राह्मण ने राजा दशरथ के रूप में जन्म लिया और अंत में बैकुंठधाम को प्राप्त किया। साधु वैश्य अगले जन्म में मोरध्वज बने, जिन्होंने अपने पुत्र को आरे से चीरकर भगवान की परीक्षा में सफल होकर मोक्ष प्राप्त किया राजा तुंगध्वज ने अगले जन्म में स्वयंभू बनकर भगवान में भक्ति करते हुए अपने कर्मों के फलस्वरूप मोक्ष पाया। इस प्रकार सत्यनारायण व्रत करने वाले हर जन्म में पुण्य पाते हैं और अंततः मोक्ष को प्राप्त होते हैं।
॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा का पंचम अध्याय समाप्त॥
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