राजस्थान के सिरोही जिले में अरावली की सुरम्य पहाड़ियों के बीच स्थित निचलागढ़ का मारकुंडेश्वर महादेव मंदिर आस्था, इतिहास और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम है। करीब 800 वर्ष पुराने इस प्राचीन शिवालय को लेकर मान्यता है कि ऋषि मार्कण्डेय ने यहां कठोर तपस्या की थी। यही कारण है कि इस पवित्र स्थल को मारकुंडेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। श्रावण मास में यहां भगवान शिव के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
गुफा में विराजमान हैं मारकुंडेश्वर महादेव
आबूरोड से करीब 20 किलोमीटर दूर निचलागढ़ गांव में स्थित यह मंदिर अपनी बनावट के कारण भी विशेष आकर्षण रखता है। भगवान शिव का यह प्राचीन मंदिर अरावली की पहाड़ी में बनी एक गुफा के भीतर स्थित है। गुफा का प्राकृतिक वातावरण मंदिर की आध्यात्मिक अनुभूति को और गहरा कर देता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह स्थान ऋषि मार्कण्डेय की तपोभूमि रहा है। मंदिर परिसर में प्राचीन शिव-पार्वती सहित अन्य प्रतिमाएं और ऐतिहासिक अवशेष भी मौजूद हैं। यहां मिले प्राचीन शिलालेख को भी मंदिर के इतिहास से जोड़कर देखा जाता है। माना जाता है कि वर्तमान मंदिर का निर्माण लगभग 13वीं शताब्दी के आसपास हुआ था और समय-समय पर इसका जीर्णोद्धार भी कराया गया।
प्राचीन जलकुंड है श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र
मारकुंडेश्वर महादेव मंदिर की एक विशेष पहचान यहां स्थित प्राचीन जलकुंड भी है। इस कुंड में गाय के मुख जैसी आकृति से लगातार जलधारा निकलती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार यह जल आसपास की पहाड़ियों से आता है और अलग-अलग मौसम में भी इसकी धारा बनी रहती है। श्रद्धालु इस जल को अत्यंत पवित्र मानते हैं और धार्मिक आस्था के साथ इसका सेवन या उपयोग करते हैं। स्थानीय विश्वास है कि इस जल से विभिन्न शारीरिक तकलीफों, विशेषकर त्वचा संबंधी समस्याओं में लाभ मिलता है। हालांकि ऐसे स्वास्थ्य संबंधी दावों को धार्मिक मान्यता के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
मन्नत पूरी होने पर चढ़ाए जाते हैं तांबे के नाग
मारकुंडेश्वर महादेव मंदिर में नाग पूजा की परंपरा भी देखने को मिलती है। मान्यता है कि मन्नत पूरी होने के बाद श्रद्धालु भगवान शिव को तांबे के नाग अर्पित करते हैं। मंदिर परिसर में अलग-अलग स्थानों पर चढ़ाए गए धातु के नाग इस परंपरा की झलक देते हैं। भगवान शिव और नाग के बीच भारतीय धार्मिक परंपरा में गहरे संबंध के कारण यहां यह श्रद्धा विशेष रूप से दिखाई देती है।
जनजातीय समाज से जुड़ी गहरी आस्था
निचलागढ़ और आसपास का क्षेत्र जनजातीय बहुल है। स्थानीय जनजातीय समुदाय की इस मंदिर के प्रति गहरी आस्था है और मंदिर की पूजा-पाठ तथा व्यवस्थाओं में समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां विशेष आयोजन और मेले का आयोजन भी किया जाता है, जिसमें आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। मारकुंडेश्वर महादेव मंदिर केवल एक प्राचीन शिवालय नहीं, बल्कि स्थानीय परंपराओं, जनजातीय आस्था और अरावली की प्राकृतिक विरासत से जुड़ा एक जीवंत धार्मिक स्थल है। गुफा में विराजमान भगवान शिव, प्राचीन प्रतिमाएं, रहस्यमयी जलधारा और सदियों पुरानी मान्यताएं इस स्थान को विशेष आध्यात्मिक पहचान देती हैं। श्रावण मास में जब हर ओर शिवभक्ति का वातावरण होता है, तब निचलागढ़ का यह प्राचीन धाम श्रद्धालुओं को भक्ति, प्रकृति और इतिहास—तीनों का एक साथ अनुभव कराता है।