नाग पंचमी के पावन पर्व पर नाग देवताओं की पूजा करने की परंपरा सदियों पुरानी है। हिंदू धर्मग्रंथों में शेषनाग, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, कालिया और धृतराष्ट्र जैसे अनेक प्रसिद्ध नागों का उल्लेख मिलता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन शक्तिशाली नागों की उत्पत्ति कैसे हुई और गरुड़ देव का नागों से क्या संबंध था? इन प्रश्नों का उत्तर महाभारत के आदिपर्व में वर्णित एक रोचक पौराणिक कथा में मिलता है। यह कथा केवल नागों की उत्पत्ति ही नहीं बताती, बल्कि कद्रू और विनता के बीच हुए विवाद, अरुण और गरुड़ के जन्म तथा विनता की दासता से मुक्ति का भी वर्णन करती है।
कद्रू और विनता को मिला वरदान
पौराणिक कथा के अनुसार, प्रजापति दक्ष की दो पुत्रियां थीं कद्रू और विनता। दोनों का विवाह महर्षि कश्यप से हुआ था। एक दिन महर्षि कश्यप अपनी दोनों पत्नियों से प्रसन्न हुए और उन्होंने उन्हें अपनी इच्छा के अनुसार वरदान मांगने को कहा। कद्रू ने समान तेज, शक्ति और पराक्रम वाले एक हजार नाग पुत्रों की कामना की। वहीं विनता ने केवल दो पुत्रों का वरदान मांगा, लेकिन उनकी इच्छा थी कि दोनों पुत्र कद्रू के पुत्रों से अधिक शक्तिशाली और तेजस्वी हों। महर्षि कश्यप ने दोनों की इच्छाएं स्वीकार कर लीं और तपस्या के लिए चले गए। कुछ समय बाद कद्रू ने एक हजार अंडे दिए, जबकि विनता ने दो अंडे दिए। दोनों ने अपने-अपने अंडों को सुरक्षित रख दिया और संतान के जन्म की प्रतीक्षा करने लगीं। लगभग पांच सौ वर्षों के बाद कद्रू के अंडों से एक-एक करके उसके नाग पुत्र जन्म लेने लगे। लेकिन विनता के अंडे अभी तक नहीं फूटे थे।
विनता की अधीरता और अरुण का जन्म
अपने अंडों से संतान को जन्म लेते न देखकर विनता अधीर हो गईं। उन्होंने जल्दबाजी में अपना एक अंडा फोड़ दिया। उसमें से एक बालक प्रकट हुआ, जिसका ऊपरी शरीर विकसित था, लेकिन निचला शरीर पूरी तरह विकसित नहीं हुआ था। उस बालक का नाम अरुण था। अपनी माता की जल्दबाजी से अरुण दुखी और क्रोधित हुए। उन्होंने कहा कि अधीरता के कारण उनका शरीर पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पाया। उन्होंने विनता को श्राप दिया कि उन्हें अपनी सौत कद्रू की दासी बनकर रहना पड़ेगा। हालांकि अरुण ने यह भी कहा कि उनका दूसरा पुत्र विनता को इस दासता से मुक्त कराएगा। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि दूसरे अंडे को समय से पहले न फोड़ा जाए। आगे चलकर अरुण सूर्यदेव के सारथी बने। कुछ समय बाद विनता के दूसरे अंडे से गरुड़ देव का जन्म हुआ। गरुड़ अत्यंत शक्तिशाली और तेजस्वी थे और आगे चलकर भगवान विष्णु के वाहन बने।
उच्चैःश्रवा को लेकर हुआ विवाद
कथा में आगे एक महत्वपूर्ण प्रसंग आता है। समुद्र मंथन के दौरान अनेक दिव्य वस्तुओं के साथ एक अद्भुत श्वेत अश्व प्रकट हुआ, जिसका नाम उच्चैःश्रवा था। एक दिन कद्रू और विनता ने उस घोड़े को देखा। कद्रू ने विनता से पूछा कि घोड़े का रंग कैसा है। विनता ने कहा कि उच्चैःश्रवा पूरी तरह सफेद है। लेकिन कद्रू ने कहा कि उसका शरीर तो सफेद है, लेकिन उसकी पूंछ काली है। दोनों बहनों के बीच विवाद बढ़ गया और उन्होंने शर्त लगा ली। यदि घोड़े की पूंछ सफेद निकली तो कद्रू विनता की दासी बनेगी और यदि पूंछ काली निकली, तो विनता को कद्रू की दासी बनना होगा। कद्रू किसी भी तरह यह शर्त जीतना चाहती थी। इसलिए उसने अपने नाग पुत्रों को आदेश दिया कि वे काले बालों का रूप धारण करके उच्चैःश्रवा की पूंछ से लिपट जाएं, जिससे उसकी पूंछ काली दिखाई दे। कद्रू के कुछ पुत्रों ने उसकी चाल में साथ देने से इनकार कर दिया। इससे क्रोधित होकर कद्रू ने उन्हें श्राप दिया कि भविष्य में राजा जनमेजय द्वारा किए जाने वाले सर्प यज्ञ में वे अग्नि में भस्म हो जाएंगे। इसी प्रसंग में कर्कोटक नाग ने अपनी माता का साथ देने की बात कही। अगले दिन जब कद्रू और विनता उच्चैःश्रवा को देखने पहुंचीं, तो उसकी पूंछ काली दिखाई दी। विनता शर्त हार गईं और उन्हें कद्रू की दासी बनना पड़ा।
गरुड़ ने कैसे छुड़ाया अपनी माता को?
समय बीतने के साथ गरुड़ को अपनी माता विनता की दासता के बारे में पता चला। अपनी माता को कद्रू और उसके नाग पुत्रों की दासता से मुक्त कराने के लिए गरुड़ ने कठिन प्रयास किया। नागों ने गरुड़ के सामने शर्त रखी कि यदि वे उनके लिए अमृत लेकर आएंगे, तभी विनता को दासता से मुक्त किया जाएगा। अपनी माता को मुक्त कराने के संकल्प के साथ गरुड़ देव अमृत प्राप्त करने के लिए निकल पड़े। अपने अद्भुत पराक्रम के बल पर गरुड़ ने देवताओं से अमृत प्राप्त किया और उसे नागों के सामने प्रस्तुत किया। इस प्रकार उन्होंने अपनी माता विनता को दासता से मुक्त कराया। गरुड़ के पराक्रम से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें अपना वाहन बनने का वरदान दिया। इसके बाद गरुड़ भगवान विष्णु के परम प्रिय और पूजनीय वाहन बने।
नागों की उत्पत्ति से जुड़ी यह कथा क्यों महत्वपूर्ण है?
कद्रू के पुत्रों से आगे चलकर अनेक प्रसिद्ध नागों का वर्णन मिलता है, जिनमें शेषनाग, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक और कालिया प्रमुख हैं। हिंदू परंपरा में इन नागों का संबंध अलग-अलग पौराणिक प्रसंगों और देवताओं से बताया गया है। नाग पंचमी पर नाग देवताओं की पूजा इसी व्यापक धार्मिक परंपरा का हिस्सा है। यह पर्व केवल नागों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने का अवसर नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान और सभी जीवों के प्रति करुणा का संदेश भी देता है। महाभारत में वर्णित कद्रू, विनता, गरुड़ और नागों की यह कथा हमें धैर्य, कर्म और संकल्प का महत्व भी समझाती है। विनता की अधीरता ने उन्हें कठिन परिस्थिति में डाल दिया, जबकि गरुड़ के साहस और दृढ़ संकल्प ने उन्हें अपनी माता को दासता से मुक्त कराने में सफल बनाया। इसीलिए नाग पंचमी के अवसर पर नाग देवताओं का स्मरण करते हुए इस प्राचीन कथा को जानना भारतीय पौराणिक परंपरा और उसके गहरे संदेशों को समझने का एक सुंदर अवसर है।