राजस्थान के कोटा के नांता क्षेत्र में स्थित करीब 500 वर्ष पुराना प्राचीन शिवालय आज भी भगवान शिव के प्रति अटूट आस्था और समर्पण का अद्भुत संदेश देता है। सावन के पावन महीने में जब हर ओर “हर-हर महादेव” और “ॐ नमः शिवाय” के जयघोष गूंजते हैं, तब इस मंदिर में श्रद्धालुओं की आस्था देखते ही बनती है।
इस प्राचीन शिवालय की सबसे विशेष पहचान यहां मौजूद एक दुर्लभ शिल्पकृति है। विशाल पत्थर की एक ही शिला को तराशकर इसमें शिवलिंग के साथ लंकापति रावण को भगवान शिव के चरणों में अपना शीश अर्पित करते हुए दर्शाया गया है। यह दृश्य रावण की उस चरम शिवभक्ति का प्रतीक माना जाता है, जिसमें भक्त अपने आराध्य के प्रति स्वयं को पूर्णतः समर्पित कर देता है।
शीश अर्पण की कथा, समर्पण की पराकाष्ठा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए वर्षों तक कठोर तपस्या की। जब उसकी साधना से महादेव प्रसन्न नहीं हुए, तो उसने अपनी भक्ति की परीक्षा देते हुए एक-एक कर अपने शीश भगवान शिव को अर्पित करने शुरू कर दिए। रावण का यह त्याग केवल तपस्या नहीं, बल्कि उसके पूर्ण आत्मसमर्पण का प्रतीक माना जाता है। उसकी इसी अडिग साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे दर्शन दिए और वरदान प्रदान किया। मान्यता है कि महादेव ने उसे दिव्य चंद्रहास तलवार भी प्रदान की। मंदिर में उकेरी गई रावण की यह प्रतिमा इसी भाव को साकार करती है—जब भक्ति में अहंकार समाप्त हो जाए और भक्त स्वयं को अपने आराध्य के चरणों में समर्पित कर दे, वही सच्ची साधना है।
शिवभक्ति का संदेश: अहंकार से समर्पण तक
रावण का चरित्र भले ही अनेक विरोधाभासों से जुड़ा रहा हो, लेकिन उसकी शिवभक्ति भारतीय पौराणिक परंपरा में विशेष रूप से वर्णित है। इस शिल्पकृति में उसका वह स्वरूप दिखाई देता है, जहां शक्ति, ज्ञान और वैभव से अधिक महत्व भक्ति और समर्पण को दिया गया है। यह प्रतिमा श्रद्धालुओं को संदेश देती है कि भगवान शिव की भक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। सच्ची भक्ति में विश्वास, धैर्य, तपस्या और पूर्ण समर्पण का भाव आवश्यक है।
जलाभिषेक की अनूठी परंपरा
सदियों पुराने इस शिवालय में शिवलिंग की प्राचीनता और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए जलाभिषेक की एक विशेष परंपरा भी निभाई जाती है। विशेष अवसरों और पर्वों पर शिवलिंग को पीतल के विशेष पात्र से ढक दिया जाता है और श्रद्धालु उसी पात्र पर जल अर्पित करते हैं। इस परंपरा में आस्था और संरक्षण दोनों का सुंदर संतुलन दिखाई देता है। भक्तों की श्रद्धा भी बनी रहती है और प्राचीन शिवलिंग को लगातार जल चढ़ाने से होने वाले क्षरण से भी बचाया जाता है।
सावन में शिवमय हो जाता है पूरा वातावरण
सावन के सोमवार को यहां सुबह की मंगला आरती से लेकर देर रात तक भक्तों की भीड़ उमड़ती है। श्रद्धालु भगवान शिव का जलाभिषेक और रुद्राभिषेक करते हैं तथा बेलपत्र, धतूरा, पुष्प और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करते हैं। मंदिर परिसर में गूंजता “हर-हर महादेव” का जयघोष वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है। हर भक्त की प्रार्थना में एक ही भाव दिखाई देता है हे महादेव, हमारे भीतर के अहंकार को दूर कर हमें सत्य, भक्ति और समर्पण के मार्ग पर चलने की शक्ति दें।
एक शिला, एक कथा और अनंत भक्ति
कोटा का यह प्राचीन शिवालय केवल स्थापत्य और इतिहास की धरोहर नहीं है, बल्कि यह सदियों से चली आ रही शिवभक्ति का जीवंत प्रतीक है। एक ही शिला पर शिवलिंग और भगवान शिव को अपना शीश अर्पित करते रावण की दुर्लभ प्रतिमा भक्त और भगवान के बीच अटूट संबंध की अनुभूति कराती है। यह शिल्प हमें याद दिलाता है कि भक्ति में सबसे बड़ा अर्पण वस्तु नहीं, बल्कि स्वयं का अहंकार है। जब मन, कर्म और भाव महादेव को समर्पित हो जाएं, तब साधना अपने सर्वोच्च रूप को प्राप्त करती है।