देवी दुर्गा की आरती करना केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि एक गहरी आध्यात्मिक प्रक्रिया है। आरती के माध्यम से भक्त अपने मन, भाव और ऊर्जा को देवी के चरणों में समर्पित करता है। अक्सर लोग आरती को सिर्फ दीपक घुमाने तक सीमित समझ लेते हैं, जबकि इसकी एक निश्चित विधि और क्रम होता है, जिसका पालन करना आवश्यक माना गया है।
आरती की विधि मुख्य रूप से तीन चरणों में पूरी होती है। सबसे पहले घी या तेल के दीपक से आरती की जाती है, जबकि कपूर (कर्पूर) की आरती हमेशा अंत में करनी चाहिए। यह क्रम बहुत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि घी का दीपक स्थिरता और श्रद्धा का प्रतीक है, वहीं कपूर वातावरण को शुद्ध करता है और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है।
आरती करते समय एक निश्चित क्रम का पालन करना चाहिए। सबसे पहले देवी के चरणों में चार बार दीपक घुमाएं। इसके बाद नाभि के सामने दो बार और फिर मुख के सामने एक बार आरती करें। इसके पश्चात पूरे शरीर को ध्यान में रखते हुए सिर से पांव तक सात बार दीपक घुमाएं। इस प्रकार कुल 14 बार आरती करने से यह पूर्ण मानी जाती है। यह विधि देवी के संपूर्ण स्वरूप की आराधना का प्रतीक है।
घी के दीपक से आरती करने के बाद अंत में कपूर की आरती करनी चाहिए। इसके पश्चात आरती की आचमनि करना जरूरी होता है, जिसमें आरती के चारों ओर जल के छींटे दिए जाते हैं। फिर सबसे पहले आरती भगवान को अर्पित करें, उसके बाद स्वयं ग्रहण करें और अन्य लोगों को भी आरती लेने दें।
आरती के अंत में श्रद्धा भाव से क्षमा प्रार्थना मंत्र का जाप करना चाहिए—
“मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरी,
यत्पूजितं मया देवी! परिपूर्ण तदस्तु मे॥”
यह मंत्र पूजा में हुई किसी भी कमी को दूर करने का भाव प्रकट करता है। सही विधि, श्रद्धा और नियमों के साथ की गई आरती ही पूर्ण फलदायी मानी जाती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।