जन्माष्टमी के बाद अब घर-घर में बाल गोपाल की छठी मनाने की तैयारियां शुरू हो गई हैं। जिस तरह किसी नवजात शिशु के जन्म के छठे दिन परिवार में विशेष उत्सव मनाया जाता है, उसी भाव से भक्त भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप यानी लड्डू गोपाल की छठी भी मनाते हैं। इस दिन उन्हें घर के नवजात बच्चे की तरह सजाया जाता है, नए वस्त्र पहनाए जाते हैं और प्रेमपूर्वक सात्विक भोजन का भोग लगाया जाता है। कई परिवारों में छठी के अवसर पर कड़ी-चावल विशेष रूप से बनाए जाते हैं। हालांकि यह हर घर की अनिवार्य धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में चली आ रही लोकपरंपरा का हिस्सा है।
इस वर्ष कान्हा की छठी की तिथि को लेकर कुछ पंचांगों में अंतर देखने को मिल रहा है। जन्माष्टमी 4 सितंबर 2026 को मनाई गई थी। जन्म के छह दिन बाद छठी मनाने की परंपरा के अनुसार कई जगह 10 सितंबर का उल्लेख मिलता है, जबकि कुछ पंचांगों और परंपराओं में 9 सितंबर को छठी मनाने की बात कही गई है। ऐसे में भक्त अपने क्षेत्र के पंचांग और परिवार की परंपरा के अनुसार पूजा की तिथि निर्धारित कर सकते हैं।
छठी पर कड़ी-चावल लगाने की परंपरा
कान्हा की छठी पर कड़ी-चावल बनाने के पीछे मुख्य रूप से घरेलू और लोक धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के छह दिन बाद उनके बाल स्वरूप की छठी मनाई गई थी। इसी भाव को भक्त आज भी अपने घरों में निभाते हैं। बाल गोपाल को परिवार के छोटे बच्चे की तरह मानकर उनके लिए भोजन तैयार किया जाता है और फिर उसे भगवान को भोग के रूप में अर्पित किया जाता है।
कड़ी-चावल को कई परिवारों में घर के सादे और सात्विक भोजन का प्रतीक माना जाता है। इसमें किसी तरह के दिखावे की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि प्रेम और श्रद्धा से तैयार किया गया भोजन ही महत्वपूर्ण माना जाता है। यही वजह है कि छठी के अवसर पर कई घरों में कड़ी-चावल बनाए जाते हैं। इसके साथ खीर, माखन-मिश्री, धनिया की पंजीरी और फल भी भोग में शामिल किए जाते हैं। हालांकि भोग की सामग्री हर परिवार की अपनी परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है।
ऐसे करें लड्डू गोपाल की पूजा
छठी के दिन सुबह स्नान करने के बाद घर और पूजा स्थान की साफ-सफाई करें। इसके बाद एक चौकी पर स्वच्छ या पीला कपड़ा बिछाकर लड्डू गोपाल को विराजमान करें। परंपरा के अनुसार उन्हें पंचामृत से स्नान कराया जा सकता है। इसके बाद साफ वस्त्र पहनाकर चंदन का तिलक लगाएं और फूल-माला, मुकुट आदि से उनका श्रृंगार करें। जिन परिवारों में बाल गोपाल को काजल लगाने की परंपरा है, वे काजल का छोटा सा टीका भी लगा सकते हैं। इसके बाद धूप-दीप जलाकर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करें और उनके मंत्रों का जाप करें। “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप किया जा सकता है। पूजा के दौरान बाल कृष्ण के प्रति वही स्नेह और अपनापन रखें, जैसे परिवार अपने छोटे बच्चे के लिए रखता है।
भोग में शामिल करें ये चीजें
कान्हा की छठी पर कड़ी-चावल के साथ माखन-मिश्री, खीर, धनिया की पंजीरी और मौसमी फल अर्पित किए जा सकते हैं। भगवान श्रीकृष्ण को माखन-मिश्री विशेष प्रिय मानी जाती है, इसलिए इसे बाल गोपाल के भोग में विशेष रूप से रखा जाता है। कई वैष्णव परंपराओं में भोग के साथ तुलसी दल अर्पित करने की भी मान्यता है। कड़ी-चावल बनाते समय कई परिवार प्याज और लहसुन का प्रयोग नहीं करते और भोजन को सात्विक तरीके से तैयार करते हैं। भोग तैयार करने में स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें और पहले भगवान को भोजन अर्पित करें, उसके बाद परिवार के सदस्य प्रसाद ग्रहण करें।
कई घरों में कान्हा की छठी पर बधाई गीत और सोहर गाने की परंपरा भी है। कहीं बाल गोपाल का विशेष श्रृंगार किया जाता है तो कहीं परिवार की पुरानी परंपरा के अनुसार अन्य रस्में निभाई जाती हैं। इन परंपराओं का स्वरूप भले ही अलग हो, लेकिन भावना एक ही है—घर में बाल कृष्ण के आगमन की खुशी मनाना। अंत में लड्डू गोपाल की आरती करें और परिवार की सुख-शांति एवं मंगल की कामना करें। कान्हा की छठी में भोग की भव्यता से ज्यादा महत्व उस भावना का है, जिसके साथ भक्त भगवान को भोजन अर्पित करता है। बाल गोपाल के लिए सबसे अनमोल भोग प्रेम, श्रद्धा और अपनापन ही माना जाता है।