“दिव्यसुधा – भक्ति की अमृत धारा” के प्रति आपके स्नेह और विश्वास के लिए हार्दिक धन्यवाद।
फरवरी 2026 का यह अंक केवल पर्व-तिथियों का संकलन नहीं, बल्कि आत्मबोध की उस निरंतर धारा का विस्तार है, जो मनुष्य को बाहरी संसार से भीतर की यात्रा पर ले जाती है। इस अंक में बिहार में स्थापित दुनिया के सबसे बड़े शिवलिंग से लेकर महाशिवरात्रि में अग्निलिंग से सृष्टि के आरंभ की दिव्य अवधारणा तक, शिव तत्व के विराट स्वरूप का अनुभव कराया गया है। संकष्टी गणेश चतुर्थी और विजया एकादशी जैसे पर्व हमें यह सिखाते हैं कि वास्तविक साधना अंतर्मुखी होती है और सच्ची विजय बाहरी नहीं, बल्कि भीतर की होती है। माघी पूर्णिमा, भौमवती अमावस्या और आमलकी एकादशी जैसे पावन अवसर आत्मशुद्धि, संकल्प और नए आरंभ की चेतना जगाते हैं।
माता सीता के जन्म का रहस्य, माता हरसिद्धि का दिव्य शक्तिपीठ और खीर भवानी मंदिर की आस्था व स्मृति हमें स्त्री शक्ति, करुणा और तपस्या की गहराई से परिचित कराते हैं। वहीं श्रीकृष्ण के दिव्य रथ, लड्डू गोपाल की लीला और ध्रुव का अपमान से अमरता तक का संकल्प यह स्मरण कराते हैं कि भक्ति में बालभाव, साहस और अडिग निश्चय कितने महत्वपूर्ण हैं।
रावण को असुर योनि क्यों मिली और जब एक माँ ने ईश्वर से वरदान में ‘सुख’ नहीं बल्कि ‘दुःख’ माँगा—जैसे विषय हमें यह सोचने पर विवश करते हैं कि धर्म केवल पूजा नहीं, बल्कि जीवन को समझने और संवारने की पद्धति है। होलाष्टक का आरम्भ भी यही संकेत देता है कि कुछ क्षण ऐसे होते हैं जब ऊर्जा बदलती है और साधक को विशेष सजगता की आवश्यकता होती है।
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