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दिव्य सुधा > व्रत और त्योहार > अहोई अष्टमी 2025: 13 या 14 अक्टूबर कब है जानिए तिथि और शुभ मुहूर्त
व्रत और त्योहार

अहोई अष्टमी 2025: 13 या 14 अक्टूबर कब है जानिए तिथि और शुभ मुहूर्त

दिव्यसुधा
Last updated: November 1, 2025 10:18 am
दिव्यसुधा
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अहोई अष्टमी 2025 कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को पड़ रही है। इस दिन माताएं अपने बच्चों की लंबी उम्र और स्वास्थ्य के लिए विशेष रूप से व्रत रखती हैं। विवाहित महिलाएं निर्जला व्रत करती हैं और शाम को तारों को देखकर उन्हें अर्घ्य देती हैं, उसके बाद व्रत का पारण करती हैं। धार्मिक मान्यता है कि अहोई अष्टमी का व्रत करने से संतान की लंबी उम्र और कल्याण की प्राप्ति होती है। यह व्रत माताओं की भक्ति और बच्चों के प्रति स्नेह का प्रतीक माना जाता है।

अहोई अष्टमी तिथि 2025

इस साल अहोई अष्टमी 2025 का व्रत सोमवार, 13 अक्टूबर को पड़ रहा है। अष्टमी तिथि की शुरुआत 13 अक्टूबर को दोपहर 12:24 बजे हो रही है, जबकि यह 14 अक्टूबर की सुबह 11:09 बजे समाप्त हो जाएगी।

शुभ मुहूर्त

अहोई अष्टमी 2025 के लिए पूजा का सबसे शुभ समय शाम 5:53 बजे से 7:08 बजे तक रहेगा, यानी कुल 1 घंटे 15 मिनट का मुहूर्त। इस दौरान माता अहोई की विधिपूर्वक पूजा करना श्रेष्ठ माना जाता है। व्रत का पारण तारों का दर्शन कर शाम 6:28 बजे से किया जा सकेगा। चंद्रोदय का समय रात 11:40 बजे है। कुछ क्षेत्रों में परंपरा के अनुसार चंद्रमा को अर्घ्य देकर ही व्रत खोला जाता है, जिससे संतान की लंबी उम्र और कल्याण की कामना पूरी होती है।

किसके लिए रखा जाता है व्रत?

अहोई अष्टमी का पर्व दिवाली पूजा से लगभग आठ दिन पहले और करवा चौथ के चार दिन बाद पड़ता है। करवा चौथ जहां पति की लंबी आयु के लिए होता है, वहीं अहोई अष्टमी का व्रत संतान की लंबी उम्र और कल्याण के लिए रखा जाता है। यह व्रत भी निर्जला होता है और माताएं इसे बड़े श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाती हैं। उत्तर भारत में विशेष रूप से इसे मनाने की परंपरा है, जहां माताएं माता अहोई की पूजा करके अपने बच्चों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।

अहोई अष्टमी का महत्व

अहोई अष्टमी के दिन माताएं सुबह से ही निर्जला उपवास का संकल्प लेती हैं। पूरे दिन बिना जल और भोजन ग्रहण किए व्रत का पालन करती हैं। सायंकाल में वे माता अहोई की पूजा करती हैं। अर्घ्य अर्पित कर अपने बच्चों की लंबी उम्र, स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना करती हैं। निसंतान महिलाएं भी इस व्रत को संतान सुख की प्राप्ति के लिए करती हैं। इस प्रकार अहोई अष्टमी माताओं की भक्ति और श्रद्धा का प्रतीक बनकर उनके जीवन में सुख और सौभाग्य का संचार करती है।

TAGGED:vart tyoharअहोई अष्टमीअहोई अष्टमी व्रतसनातन धर्म
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