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दिव्य सुधा > आरती/मंत्र > गणेश चालीसा: पाठ, महत्व, लाभ और पूजा विधि
आरती/मंत्र

गणेश चालीसा: पाठ, महत्व, लाभ और पूजा विधि

दिव्यसुधा
Last updated: August 19, 2026 12:35 pm
दिव्यसुधा
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भगवान गणेश की गणेश चालीसा पाठ करते हुए भक्तों के लिए आध्यात्मिक चित्र
श्रद्धा और एकाग्रता से करें गणेश चालीसा का पाठ, भगवान गणेश की कृपा और मंगल भाव की करें प्रार्थना।
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भगवान श्री गणेश को बुद्धि, विवेक, शुभ आरंभ, सफलता और विघ्नों के निवारण का देवता माना जाता है। गणेश चालीसा का श्रद्धापूर्वक पाठ मन को एकाग्र करने, सकारात्मक विचारों को बढ़ाने और आत्मविश्वास तथा धैर्य को मजबूत करने में सहायक माना जाता है। नए कार्य, पूजा, यात्रा या किसी महत्वपूर्ण शुभ अवसर से पहले श्री गणेश का स्मरण और गणेश चालीसा का पाठ भक्तिभाव से किया जाता है। मान्यता है कि गणपति की आराधना से जीवन में मंगल भाव बढ़ता है और साधक को भगवान गणेश की कृपा एवं संरक्षण प्राप्त होता है।

Contents
॥ दोहा ॥॥ चौपाई ॥॥ दोहा ॥

॥ दोहा ॥

जय गणपति सदगुण सदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

॥ चौपाई ॥

जय जय जय गणपति गणराजू।
मंगल भरण करण शुभ काजू॥
जय गजबदन सदन सुखदाता।
विश्व विनायका बुद्धि विधाता॥
वक्र तुण्ड शुची शुण्ड सुहावन।
तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥
राजत मणि मुक्तन उर माला।
स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं।
मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥
सुन्दर पीताम्बर तन साजित।
चरण पादुका मुनि मन राजित॥
धनि शिव सुवन षडानन भ्राता।
गौरी लालन विश्व-विख्याता॥
ऋद्धि-सिद्धि तव चंवर सुधारे।
मुषक वाहन सोहत द्वारे॥
कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी।
अति शुची पावन मंगलकारी॥
एक समय गिरिराज कुमारी।
पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी॥
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा।
तब पहुंच्यो तुम धरी द्विज रूपा॥
अतिथि जानी के गौरी सुखारी।
बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥
अति प्रसन्न हवै तुम वर दीन्हा।
मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥
मिलहि पुत्र तुहि, बुद्धि विशाला।
बिना गर्भ धारण यहि काला॥
गणनायक गुण ज्ञान निधाना।
पूजित प्रथम रूप भगवाना॥
अस कही अन्तर्धान रूप हवै।
पालना पर बालक स्वरूप हवै॥
बनि शिशु रुदन जबहिं तुम ठाना।
लखि मुख सुख नहिं गौरी समाना॥
सकल मगन, सुखमंगल गावहिं।
नाभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं॥
शम्भु, उमा, बहुदान लुटावहिं।
सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं॥
लखि अति आनन्द मंगल साजा।
देखन भी आये शनि राजा॥
निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं।
बालक, देखन चाहत नाहीं॥
गिरिजा कछु मन भेद बढायो।
उत्सव मोर, न शनि तुही भायो॥
कहत लगे शनि, मन सकुचाई।
का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई॥
नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ।
शनि सों बालक देखन कहयऊ॥
पड़तहिं शनि दृग कोण प्रकाशा।
बालक सिर उड़ि गयो अकाशा॥
गिरिजा गिरी विकल हवै धरणी।
सो दुःख दशा गयो नहीं वरणी॥
हाहाकार मच्यौ कैलाशा।
शनि कीन्हों लखि सुत को नाशा॥
तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो।
काटी चक्र सो गज सिर लाये॥
बालक के धड़ ऊपर धारयो।
प्राण मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो॥
नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे।
प्रथम पूज्य बुद्धि निधि, वर दीन्हे॥
बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा।
पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥
चले षडानन, भरमि भुलाई।
रचे बैठ तुम बुद्धि उपाई॥
चरण मातु-पितु के धर लीन्हें।
तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥
धनि गणेश कही शिव हिये हरषे।
नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥
तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई।
शेष सहसमुख सके न गाई॥
मैं मतिहीन मलीन दुखारी।
करहूं कौन विधि विनय तुम्हारी॥
भजत रामसुन्दर प्रभुदासा।
जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा॥
अब प्रभु दया दीना पर कीजै।
अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै॥

॥ दोहा ॥

श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै कर ध्यान।
नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सन्मान॥
सम्बन्ध अपने सहस्त्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश।
पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ती गणेश॥

गणेश चालीसा पाठ का महत्व
श्री गणेश चालीसा का पाठ श्रद्धा और एकाग्रता से करने की परंपरा है। भक्त भगवान गणेश से बुद्धि, विवेक, धैर्य, शुभता और जीवन के विघ्नों को दूर करने की प्रार्थना करते हैं। नियमित पाठ आध्यात्मिक साधना का एक माध्यम बन सकता है और मन में शांति तथा सकारात्मक भाव उत्पन्न करने में सहायक माना जाता है।

पाठ के समय ध्यान रखने योग्य बातें

  • स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ स्थान पर बैठें।
  • भगवान गणेश का ध्यान करके श्रद्धापूर्वक पाठ आरंभ करें।
  • संभव हो तो दीपक और पुष्प अर्पित करें।
  • पाठ के दौरान मन को शांत और एकाग्र रखने का प्रयास करें।
  • किसी नए कार्य के आरंभ से पहले गणेश जी का स्मरण करें।
  • पाठ के अंत में अपनी मनोकामना और प्रार्थना विनम्रता से भगवान के समक्ष रखें।
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