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दिव्य सुधा > आरती/मंत्र > रुद्राष्टक: भगवान शिव स्तोत्र और भक्ति का दिव्य ज्ञान
आरती/मंत्र

रुद्राष्टक: भगवान शिव स्तोत्र और भक्ति का दिव्य ज्ञान

दिव्यसुधा
Last updated: April 20, 2026 3:18 pm
दिव्यसुधा
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रुद्राष्टक के श्लोक और उनका सरल अर्थ जिसमें भगवान शिव के निराकार और करुणामय स्वरूप का वर्णन है
रुद्राष्टक: भगवान शिव की महिमा और भक्ति का दिव्य स्तोत्र
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रुद्राष्टक भगवान शिव की महिमा का अद्भुत स्तोत्र है, जिसमें उनके निराकार, सर्वव्यापक और करुणामय स्वरूप का वर्णन किया गया है। इसमें शिव को सृष्टि के कर्ता, संहारक और पालनकर्ता के रूप में बताया गया है, जो समय और गुणों से परे हैं। स्तोत्र यह सिखाता है कि सच्ची भक्ति, श्रद्धा और समर्पण से ही शिव की कृपा प्राप्त होती है। इसमें भक्त अपनी अज्ञानता स्वीकार कर भगवान से शरण मांगता है। रुद्राष्टक का पाठ मन को शांति, सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करता है तथा जीवन के दुखों को दूर करने में सहायक माना जाता है।

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाशमाकाशवासं भजेहम्

इस श्लोक में भक्त भगवान शिव को प्रणाम करता है, जो निर्वाण स्वरूप हैं और पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त हैं। वे ब्रह्म और वेदों के सार हैं, जो किसी भी गुण-दोष से परे हैं। उनका कोई निश्चित रूप नहीं है और वे आकाश के समान अनंत और व्यापक हैं। भक्त ऐसे निराकार शिव की उपासना करता है, जो हर जगह विद्यमान हैं।

निराकारमोङ्करमूलं तुरीयं
गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् ।
करालं महाकालकालं कृपालं
गुणागारसंसारपारं नतोहम्

यहां शिव को निराकार और ॐ के मूल के रूप में बताया गया है। वे ज्ञान, वाणी और सीमाओं से परे हैं तथा कैलाश के स्वामी हैं। उनका रूप महाकाल के समान भयंकर हो सकता है, लेकिन वे अत्यंत दयालु और कृपालु भी हैं। वे गुणों के भंडार हैं और संसार के बंधनों से परे हैं, इसलिए भक्त उनके सामने नतमस्तक होता है।

तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभिरं
मनोभूतकोटिप्रभाश्री शरीरम् ।
स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा
लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा

इस श्लोक में भगवान शिव के दिव्य स्वरूप का सुंदर वर्णन है। उनका शरीर हिमालय के समान उज्ज्वल और शांत है, जिनका तेज अनगिनत मनों को प्रकाशित करता है। उनकी जटाओं में बहती गंगा, मस्तक पर अर्धचंद्र और गले में सर्प उनके अद्भुत और रहस्यमयी स्वरूप को दर्शाते हैं।

चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं
प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं
प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि

यहां शिव के शांत और करुणामय स्वरूप का वर्णन है। उनके बड़े-बड़े नेत्र, प्रसन्न मुख और नीलकंठ रूप भक्तों को सुकून देते हैं। वे दयालु हैं, शेर की खाल धारण करते हैं और गले में मुंडमाला पहनते हैं। ऐसे सर्वनाथ शंकर की भक्त प्रेम और श्रद्धा से पूजा करता है।

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं
अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशं ।
त्र्यःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं
भजेहं भवानीपतिं भावगम्यम्

इस श्लोक में शिव की अपार शक्ति और तेज का वर्णन किया गया है। वे प्रचंड, असीम और अजन्मा हैं, जिनका प्रकाश हजारों सूर्यों के समान है। वे त्रिशूलधारी हैं, जो हर प्रकार की बुराई का नाश करते हैं। वे माँ पार्वती के पति हैं और सच्चे भाव से ही प्राप्त होते हैं।

कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी
सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ।
चिदानन्दसंदोह मोहापहारी
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी

इस श्लोक में शिव को समय से परे, कल्याणकारी और विनाशक बताया गया है। वे सदा सज्जनों को आनंद देते हैं और अधर्म का नाश करते हैं। वे चिदानंद के स्वरूप हैं और मोह को दूर करने वाले हैं। भक्त उनसे प्रार्थना करता है कि वे प्रसन्न होकर अपनी कृपा बनाए रखें।

न यावद् उमानाथपादारविन्दं
भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् ।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं
प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं

इस श्लोक में बताया गया है कि जब तक मनुष्य भगवान शिव के चरणों की भक्ति नहीं करता, तब तक उसे सच्चा सुख और शांति प्राप्त नहीं होती। शिव ही सभी प्राणियों में वास करते हैं और वही जीवन के दुखों का नाश करते हैं। इसलिए भक्त उनसे कृपा की प्रार्थना करता है।

न जानामि योगं जपं नैव पूजां
नतोहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम् ।
जराजन्मदुःखौघ तातप्यमानं
प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो

अंतिम श्लोक में भक्त अपनी सरलता और समर्पण व्यक्त करता है। वह कहता है कि उसे न योग आता है, न जप और न ही पूजा की विधि, फिर भी वह पूरे मन से शिव को प्रणाम करता है। वह प्रार्थना करता है कि भगवान उसके जीवन के सभी दुखों और कष्टों से रक्षा करें और उसे अपनी शरण में रखें।

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