हिंदू धर्म विश्व के सबसे प्राचीन और समृद्ध धार्मिक परंपराओं में से एक है, जिसमें असंख्य देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। इनमें त्रिदेव — ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव) — को सृष्टि के संचालन में प्रमुख भूमिका निभाने वाले देवता माना गया है। भगवान ब्रह्मा को सृष्टिकर्ता का दर्जा प्राप्त है। उनके बिना सृष्टि की कल्पना भी नहीं की जा सकती। फिर भी यह एक चौंकाने वाला तथ्य है कि उनकी पूजा आज भी बहुत सीमित स्थानों पर ही होती है। आखिर क्यों? इसके पीछे एक रोचक और रहस्यमयी पौराणिक कथा छुपी है।
त्रिदेवों में ब्रह्मा का स्थान
पुराणों के अनुसार, भगवान ब्रह्मा सृष्टि के निर्माता हैं। उन्होंने ही चारों वेदों, जीव-जंतुओं, मनुष्यों और समस्त सृष्टि की रचना की। भगवान विष्णु को पालनकर्ता और भगवान शिव को संहारक माना गया है। यह त्रिदेव मिलकर सृष्टि के चक्र को संतुलित रूप से चलाते हैं। फिर भी जहां शिव और विष्णु की पूजा और मंदिरों की संख्या अनगिनत है, वहीं ब्रह्मा जी के नाम पर पूरे भारत में कुछ गिने-चुने मंदिर ही मिलते हैं। सबसे प्रसिद्ध मंदिर पुष्कर (राजस्थान) में स्थित है।
ब्रह्मा जी की पूजा न होने के पीछे की पौराणिक कथा
ब्रह्मवैवर्त पुराण और शिव पुराण समेत कई धार्मिक ग्रंथों में इस रहस्य को उजागर करने वाली एक कथा मिलती है। कथा के अनुसार एक समय की बात है जब ब्रह्मा जी और विष्णु जी के बीच यह विवाद उत्पन्न हो गया कि कौन श्रेष्ठ है। यह विवाद इतना बढ़ गया कि ब्रह्मांड में हलचल मच गई।
उसी समय एक अद्भुत अग्निस्तंभ (ज्योतिर्लिंग) प्रकट हुआ, जो आकाश से पाताल तक फैला हुआ था। यह भगवान शिव का रूप था, जिन्होंने दोनों देवताओं की परीक्षा लेनी चाही। शिव जी ने कहा कि जो भी इस अग्निस्तंभ का सिरा खोज लाएगा, वही सबसे श्रेष्ठ माना जाएगा।
विष्णु जी नीचे की दिशा में पाताल की ओर चले और ब्रह्मा जी ऊपर की दिशा में। विष्णु जी बहुत दूर तक गए लेकिन अंत नहीं मिला, अतः उन्होंने हार मान ली। वहीं ब्रह्मा जी ने ऊपर उड़ते हुए एक केतकी पुष्प को देखा जो उस अग्निस्तंभ से गिर रहा था। ब्रह्मा जी ने उस पुष्प से झूठ बोलने का अनुरोध किया कि वह उन्हें स्टंभ के अंत तक पहुंचा हुआ बताए। केतकी फूल ने उनकी बात मान ली और दोनों भगवान शिव के पास लौटे।
जब ब्रह्मा जी ने यह दावा किया कि उन्होंने स्तंभ का शीर्ष देख लिया है और केतकी फूल ने भी उनकी बात की पुष्टि की, तब भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो उठे। उन्होंने ब्रह्मा जी को झूठ बोलने के लिए दंडित किया और कहा कि भविष्य में ब्रह्मा जी की पृथ्वी पर पूजा नहीं होगी। साथ ही, केतकी फूल को भी शाप दिया गया कि उसे भी पूजा में स्थान नहीं मिलेगा।
शिव के श्राप का परिणाम
इस श्राप के बाद से ही धरती पर ब्रह्मा जी की पूजा का चलन समाप्त हो गया। केवल कुछ विशेष स्थानों पर ही उनकी पूजा होती है, जैसे पुष्कर में। वहाँ भी एक विशेष अवसर पर ही पूजा की जाती है। इस घटना ने यह सिखाया कि सत्य की राह ही सर्वोपरि है, और झूठ बोलने से देवता भी दंड के भागी बन सकते हैं।
सीख और धार्मिक संदेश
यह कथा हमें यह भी सिखाती है कि श्रेष्ठता की होड़ में जब अंहकार आ जाता है, तो सत्य की राह से भटकने का खतरा बढ़ जाता है। भगवान शिव ने यह स्पष्ट कर दिया कि चाहे कोई भी देवता हो, अगर वह अधर्म या असत्य का सहारा लेगा, तो दंड निश्चित है।