हिंदू धर्म में हर साल भाद्रपद मास में विश्वकर्मा जयंती मनाई जाती भगवान विश्वकर्मा को ब्रह्मांड के प्रथम शिल्पकार, दिव्य वास्तुकार और सभी प्रकार की मशीनरी, उपकरणों और तकनीकी विज्ञान के जनक के रूप में पूजा जाता है उन्हें देवताओं के महाशिल्पी की उपाधि प्राप्त है, जिन्होंने स्वर्गलोक, पुष्पक विमान, भगवान शिव का त्रिशूल, विष्णु का सुदर्शन चक्र, यमराज का कालदंड और यहां तक कि द्वारका नगरी जैसी दिव्य रचनाओं का निर्माण किया। हर वर्ष भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को विश्वकर्मा जयंती के रूप में मनाया जाता है, जिसे आम बोलचाल में विश्वकर्मा पूजा भी कहा जाता है यह दिन विशेष रूप से कारखानों, दुकानों, ऑफिसों, शिल्प एवं तकनीकी संस्थानों, और मशीनों के पूजन के लिए समर्पित होता है।
आपको बता दें इस दिन लोग अपने औद्योगिक उपकरणों, वाहनों, मशीनों और कार्यस्थलों की विधिपूर्वक पूजा कर, भगवान विश्वकर्मा से समृद्धि, सुरक्षा और कार्यकुशलता का आशीर्वाद मांगते हैं। यह केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि उद्योगों और तकनीकी कार्यक्षेत्रों में काम करने वाले करोड़ों लोगों की भावनात्मक और आध्यात्मिक आस्था का प्रतीक बन चुका है। मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने से व्यवसाय में निरंतर प्रगति होती है, मशीनों में कोई खराबी नहीं आती, दुर्घटनाओं से रक्षा होती है और कार्यस्थल पर सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है। विशेष रूप से इंजीनियरों, आर्टिज़न्स, आर्किटेक्ट्स, टेक्नीशियनों और फैक्ट्री वर्कर्स के लिए यह दिन अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह उन्हें उनके पेशे और साधनों के प्रति सम्मान और आभार प्रकट करने का अवसर देता है।
तो वहीं इस दिन कई स्थानों पर कर्मस्थलों पर अवकाश रखा जाता है, मशीनों की सफाई की जाती है, उन्हें सजाया जाता है, और फूल, रोली, अक्षत, धूप-दीप से विधिवत पूजन किया जाता है। पूजा के बाद प्रसाद और भंडारे का आयोजन कर भगवान से जीवन और व्यवसाय में निरंतर गति, सफलता और संतुलन की प्रार्थना की जाती है। वस्तुतः, विश्वकर्मा पूजा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आधुनिक विज्ञान और प्राचीन आध्यात्मिकता का संगम है, जहाँ श्रम, साधन और संकल्प – तीनों का सम्मान किया जाता है
भगवान विश्वकर्मा की पूजा 17 सितंबर को क्यों की जाती है?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी तिथि को भगवान विश्वकर्मा ने ब्रह्मांड की रचना, स्वर्गलोक, पुष्पक विमान, द्वारका नगरी, शिव के त्रिशूल आदि का निर्माण कार्य प्रारंभ किया था।
सूर्य के संक्रमण का विशेष योग
17 सितंबर के आसपास सूर्य का सिंह राशि से कन्या राशि में संक्रमण होता है, जिसे “कन्या संक्रांति” भी कहा जाता है।यह काल नया कार्य आरंभ करने और मशीनरी, औजारों की पूजा के लिए अत्यंत शुभ माना गया है।
रहस्य यह भी है
कन्या संक्रांति के समय पूजा करने से कार्यक्षमता, उत्पादन और समृद्धि कई गुना बढ़ती है — ऐसा शास्त्रों में कहा गया है।
विश्वकर्मा पूजा के लिए इन चीजों की आवश्यकता होगी
भगवान विश्वकर्मा की तस्वीर, अक्षत, कुमकुम, गुलाल, सुपारी, फूल, रक्षासूत्र, फल, मिठाई, धूप, दही, दीपक, लकड़ी की चौकी, लाल या पीला वस्त्र आसन के लिए, पंचामृत, इलायची, जल से भरा कलश, गंगाजल और पंचमेवा।
पूजा विधि
अपने पूजा स्थल को पहले अच्छी तरह साफ कर लें। इसके बाद, वहां लकड़ी के चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं और उस पर विश्वकर्मा भगवान की तस्वीर रखें। इसके बाद, अपने औजारों, मशीनों आदि को भी अच्छी तरह साफ करके रख लें। अब कुमकुम, अक्षत, फूल, गुलाल, धूप आदि से विधि-विधान से भगवान की पूजा करें। साथ ही, उन्हें पंचमेवा, मिठाई और फल भी जरूर चढ़ाएं। पूजा स्थल पर एक जल से भरा कलश भी जरूर रखें और उस पर रोली व अक्षत लगाएं। साथ ही, अपने मशीनों और औजारों पर भी तिलक व अक्षत लगाएं। सभी औजारों पर फूल चढ़ाकर विश्वकर्मा भगवान की आरती करें और आखिर में सभी में प्रसाद बांटें।