अरावली की खूबसूरत पहाड़ियों, घने जंगलों और झरनों के बीच स्थित तिलेश्वर महादेव मंदिर भगवान शिव का एक अनोखा और प्राकृतिक शिव धाम माना जाता है। उदयपुर और पाली-सिरोही की सीमा से लगे इस क्षेत्र में स्थित यह मंदिर अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ कठिन और रोमांचक रास्ते के लिए भी श्रद्धालुओं के बीच खास आकर्षण रखता है। यहां पहुंचने के बाद भक्तों को पहाड़ी से करीब 50 फीट नीचे प्राकृतिक गुफा में उतरना पड़ता है, जहां भगवान शिव के दर्शन होते हैं। मान्यता और स्थानीय आस्था के अनुसार, तिलेश्वर महादेव के दर्शन के लिए श्रद्धालु विशेष रूप से सावन और भाद्रपद के महीनों में बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। बारिश के मौसम में आसपास की पहाड़ियां हरियाली से ढक जाती हैं और मंदिर के पास बहने वाला झरना इस पूरे क्षेत्र की सुंदरता को और बढ़ा देता है।
तिल चढ़ाने की अनोखी परंपरा
तिलेश्वर महादेव मंदिर की सबसे खास धार्मिक परंपराओं में भगवान शिव को तिल अर्पित करना शामिल है। श्रद्धालु महादेव को तिल चढ़ाकर अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं। इसी परंपरा के कारण इस शिव धाम को तिलेश्वर महादेव के नाम से विशेष पहचान मिली है। भक्तों के लिए यहां की यात्रा केवल दर्शन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि गुफा तक पहुंचने का अनुभव भी अपने आप में बेहद अलग होता है। 50 फीट नीचे गुफा में होते हैं महादेव के दर्शन यह मंदिर पहाड़ियों के बीच एक प्राकृतिक गुफा में स्थित है। श्रद्धालुओं को मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब 50 फीट नीचे उतरना पड़ता है। रास्ते में जंजीरों और लोहे की सीढ़ियों का सहारा लेना पड़ता है। स्थानीय जानकारी के अनुसार, गुफा तक पहुंचने के लिए लगभग पांच से सात जंजीरों का सहारा लिया जाता है। गुफा के भीतर पहुंचने के बाद भी भगवान शिव के दर्शन एक अलग अनुभव देते हैं। बताया जाता है कि गुफा के भीतर शिवलिंग कुछ ऊंचाई पर स्थित है और श्रद्धालुओं को लोहे की सीढ़ियों पर खड़े होकर दर्शन करने पड़ते हैं।
झरने के पीछे छिपा है शिव धाम
तिलेश्वर महादेव मंदिर की प्राकृतिक खूबसूरती इसे और खास बनाती है। मंदिर के ऊपर और आसपास झरने बहते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, यहां का झरना लंबे समय तक बहता रहता है। बारिश के मौसम में पानी का प्रवाह बढ़ने के साथ पहाड़ियों की हरियाली और चट्टानों के बीच बहती जलधाराएं इस स्थान को बेहद मनमोहक बना देती हैं। यही वजह है कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं को भगवान शिव के दर्शन के साथ प्रकृति के अद्भुत स्वरूप का अनुभव भी मिलता है।
शिवलिंग और नंदी की स्थापना
स्थानीय जानकारी के अनुसार, कुछ श्रद्धालुओं और मित्रों ने मिलकर यहां 125 किलो वजनी शिवलिंग और 50 किलो वजनी नंदी की स्थापना भी की थी। इसके बाद यहां पूजा-अर्चना की परंपरा और मजबूत हुई। हालांकि इस स्थान की धार्मिक आस्था इससे कहीं पुरानी मानी जाती है और स्थानीय श्रद्धालु इसे प्राकृतिक देवस्थान के रूप में पूजते हैं।
सावन में उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़
वैसे तो यहां पूरे वर्ष श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन सावन और भाद्रपद में मंदिर का विशेष आकर्षण देखने को मिलता है। सावन के दौरान भक्त भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं, तिल अर्पित करते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं। मानसून के समय मंदिर की प्राकृतिक सुंदरता अपने चरम पर होती है, लेकिन गुफा तक पहुंचने वाला रास्ता फिसलन भरा और पानी के बहाव वाला हो सकता है। इसलिए श्रद्धालुओं को स्थानीय लोगों के मार्गदर्शन में सावधानीपूर्वक यात्रा करनी चाहिए। प्रकृति की गोद में, पहाड़ों के बीच और करीब 50 फीट गहरी गुफा में विराजमान तिलेश्वर महादेव का यह धाम आस्था और प्राकृतिक सौंदर्य का अनोखा संगम है। यही वजह है कि यहां पहुंचने वाले भक्तों के लिए महादेव के दर्शन का अनुभव लंबे समय तक यादगार बना रहता है।