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दिव्य सुधा > सनातन धर्म > भगवान > रक्षाबंधन पर खुलने वाला रहस्यमयी वंशी नारायण मंदिर – 364 दिन बंद, सिर्फ एक दिन खुलते हैं पट
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रक्षाबंधन पर खुलने वाला रहस्यमयी वंशी नारायण मंदिर – 364 दिन बंद, सिर्फ एक दिन खुलते हैं पट

आस्था, परंपरा और रहस्य का संगम – वंशी नारायण मंदिर

दिव्यसुधा
Last updated: August 8, 2025 12:00 pm
दिव्यसुधा
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वादियों के बीच, बादलों की गोद में – जहां रक्षाबंधन पर खुलते हैं भगवान वंशी नारायण के द्वार"
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Highlights
  • वंशी नारायण मंदिर – 364 दिन बंद, सिर्फ रक्षाबंधन पर खुलता है।
  • लोकेशन: चमोली जिला, उरगाम घाटी, उत्तराखंड।
  • पौराणिक कथा में माता लक्ष्मी, राजा बलि और भगवान विष्णु का प्रसंग।

भारत के मंदिर केवल आस्था के प्रतीक ही नहीं, बल्कि रहस्य और पौराणिक कथाओं से भी भरे हुए हैं। इन्हीं में से एक है उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित वंशी नारायण मंदिर, जो साल के 364 दिन बंद रहता है और केवल रक्षाबंधन के दिन खुलता है। भगवान विष्णु को समर्पित यह मंदिर अपनी अनोखी परंपरा, अद्भुत लोकेशन और धार्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है।

उत्तराखंड की खूबसूरत उरगाम घाटी में बसा वंशी नारायण मंदिर, कलगोठ गांव के पास समुद्र तल से ऊंचाई पर स्थित है। यहां तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को देवग्राम से शुरू होकर लगभग 15 किलोमीटर का कठिन ट्रेक करना पड़ता है। इस सफर में गांवों की प्राकृतिक सुंदरता, हरे-भरे जंगल, हिमालयी पक्षी और प्राचीन गुफाओं के दर्शन होते हैं। रास्ते में मुलखर्क, भागवती देवी मंदिर और छेत्रपाल मंदिर जैसे अन्य धार्मिक स्थल भी आते हैं, जो यात्रा को और भी पवित्र बना देते हैं।

मंदिर साल में केवल एक दिन ही क्यों खुलता है?
स्थानीय मान्यता के अनुसार, 364 दिन तक नारद मुनि स्वयं भगवान नारायण की पूजा करते हैं। सावन पूर्णिमा यानी रक्षाबंधन के दिन, नारद मुनि माता लक्ष्मी के साथ पाताल लोक चले जाते हैं। उस दिन वे भगवान की पूजा नहीं कर पाते और तब स्थानीय लोग यह जिम्मेदारी निभाते हैं। इसी दिन मंदिर के कपाट खोले जाते हैं और भक्त भगवान वंशी नारायण के दर्शन करते हैं।

पौराणिक कथा और रक्षाबंधन का महत्व
कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु राजा बलि के द्वारपाल बन गए थे, जिससे माता लक्ष्मी उनसे लंबे समय तक नहीं मिल पाईं। परेशान होकर उन्होंने नारद मुनि से मदद मांगी। नारद मुनि ने सलाह दी कि सावन पूर्णिमा के दिन राजा बलि को राखी बांधकर भगवान विष्णु को पाताल लोक से मुक्त कराएं। माता लक्ष्मी ने यही किया और रक्षाबंधन के दिन भगवान विष्णु मुक्त होकर लौट आए। कहा जाता है कि पाताल लोक से लौटने के बाद भगवान सबसे पहले वंशी नारायण मंदिर में प्रकट हुए।

रक्षाबंधन पर मंदिर में क्या होता है खास
रक्षाबंधन के दिन जैसे ही मंदिर के दरवाजे खुलते हैं, कलगोठ गांव के हर घर से भगवान के लिए मक्खन का भोग लाया जाता है। इससे भगवान वंशी नारायण का विशेष प्रसाद तैयार होता है। मंदिर प्रांगण में खिलने वाले दुर्लभ फूल इस दिन भगवान की मूर्ति को सजाने के लिए तोड़े जाते हैं। खास बात यह है कि ये फूल पूरे साल नहीं तोड़े जाते और केवल इस एक दिन के लिए ही उनका उपयोग होता है।

स्थापत्य और ऐतिहासिक महत्व
वंशी नारायण मंदिर कत्यूर शैली में बना हुआ है। गर्भगृह वर्गाकार है और मंदिर की ऊंचाई लगभग 10 फीट है। इसमें भगवान नारायण की चतुर्भुज मूर्ति विराजमान है। माना जाता है कि मंदिर का निर्माण 8वीं शताब्दी में हुआ था। धार्मिक और स्थापत्य दृष्टि से यह मंदिर अत्यंत महत्वपूर्ण है।

आस्था का अद्भुत संगम
भले ही यह मंदिर साल में सिर्फ एक दिन खुलता है, लेकिन इस एक दिन में हजारों श्रद्धालु दूर-दूर से यहां आते हैं। रक्षाबंधन पर यह जगह सिर्फ पूजा का स्थल नहीं, बल्कि भक्ति, परंपरा और भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का अद्भुत संगम बन जाती है।

स्थानीय लोगों की मान्यता
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि वंशी नारायण मंदिर में पूजा का अनुभव अलौकिक होता है। उनका मानना है कि जो भी भक्त श्रद्धा और सच्चे मन से इस दिन भगवान के दर्शन करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

भविष्य की संभावनाएं और पर्यटन
उत्तराखंड सरकार और स्थानीय प्रशासन इस मंदिर को धार्मिक पर्यटन के मानचित्र पर और प्रमुखता से लाने की योजना बना रहे हैं। यहां के ट्रेक मार्ग को और सुविधाजनक बनाने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं, ताकि अधिक से अधिक लोग इस अनोखे अनुभव का हिस्सा बन सकें।

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