सनातन परंपरा में देवी-देवताओं की छवि केवल चित्र नहीं होती, बल्कि वह श्रद्धा, विश्वास और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक मानी जाती है। ऐसे में जब पवित्र देवी-देवताओं के चित्र और श्लोक सिंगल यूज प्लास्टिक जैसे अस्थायी उत्पादों पर छापे जाते हैं, तो यह विषय केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आस्था और सम्मान से भी गहराई से जुड़ जाता है।
हाल ही में राज्यसभा में भाजपा सांसद बृजलाल ने इस गंभीर विषय को उठाते हुए कहा कि आज बाजार में कई ऐसे प्लास्टिक उत्पाद उपलब्ध हैं जिन पर देवी-देवताओं की तस्वीरें और पवित्र मंत्र छपे होते हैं। ये अधिकतर वस्तुएं एकल उपयोग वाली होती हैं और प्रयोग के बाद नालियों या कूड़े में फेंक दी जाती हैं। इससे अनजाने में पवित्र प्रतीकों का अपमान होता है, जो सनातन संस्कृति के मूल भाव के विपरीत है।
उन्होंने यह भी बताया कि इस तरह का प्लास्टिक कचरा न केवल धार्मिक भावनाओं को आहत करता है, बल्कि पर्यावरण के लिए भी अत्यंत घातक सिद्ध हो रहा है। नालियों में फेंका गया प्लास्टिक जल प्रवाह को बाधित करता है, जलजनित बीमारियों को जन्म देता है और जलीय जीवों के जीवन पर भी संकट खड़ा करता है। प्रकृति, जिसे हम मां का दर्जा देते हैं, उसी प्रकृति को हम ऐसे कचरे से दूषित कर रहे हैं।
सनातन धर्म में स्वच्छता को ईश्वर सेवा के समान माना गया है। शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि जहां स्वच्छता होती है, वहीं देवताओं का वास होता है। ऐसे में पवित्र छवियों का कचरे में जाना हमारी सामूहिक चेतना पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। इसी भाव के साथ सांसद बृजलाल ने मांग की कि ऐसे विज्ञापनों और उत्पादों पर रोक लगाई जाए, जिनसे देवी-देवताओं के सम्मान को ठेस पहुंचती है।
शून्यकाल के दौरान अन्य सदस्यों ने भी सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दे उठाए, जिनमें छोटे दुकानदारों पर ऑनलाइन व्यापार का प्रभाव और टीवी चैनलों पर प्रसारित आपत्तिजनक विज्ञापनों का विषय शामिल रहा। ये सभी विषय कहीं न कहीं हमारे सामाजिक और नैतिक मूल्यों से जुड़े हैं।
आज आवश्यकता है कि हम आधुनिक उपभोग की आदतों के साथ-साथ अपनी आध्यात्मिक जिम्मेदारियों को भी समझें। देवी-देवताओं के चित्रों का उपयोग केवल पूजन और श्रद्धा तक सीमित रहना चाहिए, न कि व्यावसायिक वस्तुओं पर छपकर कचरे का हिस्सा बनने तक। साथ ही, पर्यावरण संरक्षण को भी धार्मिक कर्तव्य मानते हुए प्लास्टिक मुक्त जीवनशैली की ओर कदम बढ़ाना समय की मांग है।
आस्था और प्रकृति दोनों ही हमारे जीवन के आधार हैं। जब इन दोनों का सम्मान साथ-साथ होगा, तभी सच्चे अर्थों में आध्यात्मिक और संतुलित समाज की स्थापना संभव हो सकेगी।