अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर आज केवल श्रद्धा का केंद्र नहीं रह गया है, बल्कि यह भारत की प्राचीन सांस्कृतिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विरासत का वैश्विक प्रतीक बनता जा रहा है। इसी क्रम में एक ऐतिहासिक पहल के तहत लगभग 400 वर्ष पुरानी वाल्मीकि रामायण की दुर्लभ प्रति को श्रीराम मंदिर परिसर में स्थापित करने का निर्णय लिया गया है। यह कदम रामकथा की अक्षुण्ण परंपरा को सहेजने और सनातन संस्कृति को भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने की दिशा में मील का पत्थर माना जा रहा है।
अब तक यह दुर्लभ ग्रंथ राष्ट्रपति भवन के संग्रहालय में भारत की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर के रूप में संरक्षित था। हाल ही में इसे श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को समर्पित किया गया है, जिससे यह पावन ग्रंथ भगवान श्रीराम की जन्मस्थली पर विराजमान होगा। यह निर्णय आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे रामकथा का मूल स्रोत सीधे श्रद्धालुओं से जुड़ सकेगा।
राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा के अनुसार, यह प्राचीन वाल्मीकि रामायण दिल्ली स्थित केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा ट्रस्ट को प्रदान की गई है। उन्होंने बताया कि यह केवल मूल रामायण नहीं है, बल्कि इसमें संस्कृत परंपरा पर आधारित विस्तृत टीकाएँ भी सम्मिलित हैं, जिससे इसका दार्शनिक, ऐतिहासिक और अकादमिक महत्व और अधिक बढ़ जाता है।
इस दुर्लभ ग्रंथ की स्थापना का उद्देश्य केवल प्रदर्शन नहीं है, बल्कि इसे श्रद्धालुओं, विद्वानों और शोधार्थियों के लिए ज्ञान के केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा। मंदिर परिसर में इसकी उपस्थिति से रामकथा, भारतीय दर्शन और सनातन विचारधारा के अध्ययन को नई दिशा मिलने की उम्मीद है।
राम मंदिर ट्रस्ट की योजना यहीं तक सीमित नहीं है। ट्रस्ट देशभर में उपलब्ध प्राचीन रामायण पांडुलिपियों और भगवान श्रीराम से जुड़ी दुर्लभ सांस्कृतिक धरोहरों को भी संरक्षित करने की तैयारी कर रहा है। इसके लिए जल्द ही सार्वजनिक विज्ञापन जारी किया जाएगा, जिसमें नागरिकों, संस्थानों और संग्रहकर्ताओं को अपनी धरोहर साझा करने के लिए आमंत्रित किया जाएगा।
प्राप्त होने वाले प्रत्येक ग्रंथ और पांडुलिपि का मूल्यांकन विशेषज्ञ समिति द्वारा किया जाएगा। यह समिति उनकी ऐतिहासिक प्रामाणिकता, संरक्षण की स्थिति और विद्वत महत्व की गहन जांच करेगी। चयनित धरोहरों को भगवान श्रीराम के गर्भगृह परिसर में सम्मानपूर्वक स्थापित किया जाएगा।
इसी क्रम में श्रीराम मंदिर में श्रीराम यंत्र की स्थापना का प्रस्ताव भी रखा गया है। आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाने वाले इस यंत्र से मंदिर की ऊर्जा और सांस्कृतिक गरिमा को और अधिक सुदृढ़ करने की बात कही जा रही है।
वाल्मीकि रामायण की दुर्लभ प्रति और अन्य प्राचीन ग्रंथों का संरक्षण भारत की सनातन विरासत को वैश्विक मंच पर नई पहचान देगा। यह पहल न केवल अतीत को सहेजने का प्रयास है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भारत की ज्ञान परंपरा को जीवंत बनाए रखने की एक प्रेरणादायी शुरुआत भी है।