छठ महापर्व का दूसरा दिन “खरना” न केवल तपस्या और भक्ति का प्रतीक है, बल्कि यह आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक जागरण का भी दिवस है। इस दिन व्रती सूर्यदेव और छठी मैया की आराधना करते हैं तथा अगले दो दिनों के कठिन निर्जला व्रत की तैयारी करते हैं। खरना का दिन शरीर, मन और आत्मा की एक ऐसी साधना है जो साधक को दिव्य ऊर्जा से जोड़ती है।
छठ पूजा का दूसरा दिन – खरना या लोहंडा
छठ पर्व चार दिनों तक मनाया जाने वाला महान उत्सव है, जिसकी शुरुआत “नहाय-खाय” से होती है। दूसरे दिन “खरना” या “लोहंडा” का विशेष आयोजन किया जाता है। इस दिन व्रती पूरे दिन उपवास रखकर संध्या के समय सूर्यास्त के बाद खरना का प्रसाद ग्रहण करते हैं और अगले 36 घंटे का निर्जला व्रत आरंभ करते हैं। इस दिन छठी मैया की आराधना के साथ सूर्यदेव को विशेष रूप से अर्घ्य दिया जाता है। श्रद्धालु मानते हैं कि खरना के दिन व्रत रखने से शरीर की पवित्रता और आत्मा की शुद्धि होती है। यही आत्मशक्ति आने वाले दो दिनों की तपस्या को संभव बनाती है।
छठ पूजा में खरना का महत्व
छठ पूजा के चारों दिन आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष माने गए हैं। दूसरे दिन का “खरना” तप, संयम और समर्पण का प्रतीक है। “खरना” शब्द का अर्थ होता है आत्मशुद्धि या आत्मसंयम के माध्यम से ईश्वरीय ऊर्जा से जुड़ना। इस दिन व्रती पूरे दिन जल तक ग्रहण नहीं करते। सूर्यास्त के बाद वे गुड़ और चावल से बनी “रसियाव खीर”, रोटी या पूड़ी, और फल का प्रसाद बनाकर छठी मैया को अर्पित करते हैं। इसके बाद व्रती प्रसाद ग्रहण करते हैं और परिवार के अन्य सदस्यों को वितरित करते हैं। यही वह क्षण होता है जब साधक का शरीर और मन पूर्ण रूप से शुद्ध हो जाता है और 36 घंटे का निर्जला तप प्रारंभ होता है।
चार शुभ योगों का बना संयोग
इस वर्ष 2025 में छठ पूजा का दूसरा दिन, यानी खरना, चार शुभ योगों में मनाया जा रहा है —
सर्वार्थ सिद्धि योग, जो सभी कार्यों को सफल बनाता है;
रवि योग, जो सभी दोषों को नष्ट करता है;
शोभन योग, जो सौभाग्य और समृद्धि लाता है;
और नवपंचम राजयोग, जो गुरु-बुध के मिलन से बनता है और ज्ञान व धन वृद्धि का प्रतीक है।
खरना की पूजा विधि
खरना की पूजा पूर्ण शुद्धता और निष्ठा से की जाती है। सुबह व्रती स्नान के बाद घर या आंगन की मिट्टी से लिपाई करते हैं और पूजा स्थल को सजाते हैं। दिनभर व्रत रखने के बाद सूर्यास्त के समय मिट्टी के चूल्हे पर गुड़-चावल की खीर (रसियाव), रोटी और केला प्रसाद के रूप में तैयार किया जाता है। केले के पत्ते पर प्रसाद सजाकर छठी मैया और सूर्यदेव की पूजा की जाती है। दीपक जलाकर व्रती आरती करते हैं और भगवान सूर्य से जीवन में प्रकाश, ऊर्जा और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। इसके बाद व्रती प्रसाद ग्रहण करते हैं और परिवार के अन्य सदस्यों में बांटते हैं। यही वह पवित्र क्षण होता है जब 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाता है।