लखनऊ। विश्व हिंदू परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्री मिलिंद परांडे ने आज पुराने लखनऊ स्थित कपीश्वर वैदिक गुरुकुल में आयोजित धर्म संवाद सत्र में समाज के विभिन्न वर्गों से आए बुद्धिजीवियों को संबोधित करते हुए कहा कि “हिंदुत्व और हिंदू समाज की रक्षा हेतु आज से ही योजनाबद्ध कार्य करना आवश्यक है ताकि आने वाले 25 वर्षों में हमारी सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रहे।” इस विचारशील संवाद सत्र का उद्देश्य सनातन संस्कृति की रक्षा, युवा पीढ़ी में धार्मिक चेतना का विकास एवं समाज में वैचारिक एकता को बढ़ावा देना था।
धर्म संवाद सत्र के मुख्य बिंदु:
हिंदुत्व की स्थायित्व की योजना: श्री परांडे ने स्पष्ट कहा कि “अगर हिंदू बंटे तो कमजोर होंगे।” इसलिए संगठनात्मक एकता और वैचारिक स्पष्टता अत्यंत आवश्यक है।
युवा पीढ़ी और संस्कृति से दूरी:
उन्होंने यह भी कहा कि आज की युवा पीढ़ी की भटकन का कारण उनकी अपनी संस्कृति एवं मूल परंपराओं से दूरी है। सनातन की समृद्ध परंपराएं विश्व में अद्वितीय हैं, इस पर हमें गर्व होना चाहिए।
सनातन परंपरा का संरक्षण:
चिन्मय मिशन से स्वामी कौशिक चैतन्य, कामख्या धाम के पीठाधीश्वर इंद्रेश कौशिक जी, एवं सवायजपुर हरदोई के विधायक श्री माधवेन्द्र प्रताप सिंह ने भी अपने-अपने वक्तव्यों में वसुधैव कुटुंबकम की सनातन अवधारणा को बल दिया और वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उसकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।
गुरुकुल की भूमिका पर जोर
कपीश्वर वैदिक गुरुकुल के प्रमुख डॉ. विवेक तांगडी ने गुरुकुल की महत्ता और श्री लेटे हुए हनुमान जी मंदिर के ऐतिहासिक एवं धार्मिक पक्षों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि: “हिंदुत्व की रक्षा बाल्यकाल से ही आरंभ होनी चाहिए। बच्चों को प्राथमिक शिक्षा गुरुकुल से मिले, वे मंदिर जाएं, और प्रत्येक परिवार मंदिर में ही जन्मदिन मनाने की परंपरा अपनाए – यही संस्कृति के संरक्षण का आधार बनेगा।” उन्होंने समाज से अपील की कि वे अपने बच्चों को गुरुकुल पद्धति से जोड़ें और सनातन संस्कारों की नींव घर और मंदिर से रखें।

सांस्कृतिक सम्मान और सहभागिता
कार्यक्रम में गुरुकुल बोर्ड के सदस्य डॉ. पंकज सिंह भदौरिया ने मुख्य अतिथि श्री मिलिंद परांडे को गदा एवं स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया। वहीं ऋद्धि किशोर गौड़ द्वारा अन्य अतिथियों का सम्मान किया गया। श्री लेटे हुए हनुमान जी मंदिर ट्रस्ट के सभी सम्मानित ट्रस्टीगण सभी ने अपने-अपने अनुभव साझा करते हुए सनातन संस्कृति के पुनरुत्थान की आवश्यकता पर जोर दिया।
आशय और भविष्य की दिशा
इस संवाद सत्र में यह स्पष्ट रूप से सामने आया कि धार्मिक जागरूकता केवल पूजन या अनुष्ठान तक सीमित न रहे, बल्कि यह सामाजिक चेतना एवं सांस्कृतिक संरक्षण का माध्यम बने। इसके लिए गुरुकुल, मंदिर एवं धर्मिक संगठनों को मिलकर काम करना होगा।
श्री परांडे के शब्दों में, “हमें आज से ही 25 साल आगे की सोच बनानी होगी, ताकि हमारे आने वाले पीढ़ियां भी गर्व से कह सकें कि वे हिंदू हैं।”