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दिव्य सुधा > व्रत और त्योहार > निर्जला एकादशी 2026: तिथि, व्रत विधि, कथा, पारण समय और महत्व
व्रत और त्योहार

निर्जला एकादशी 2026: तिथि, व्रत विधि, कथा, पारण समय और महत्व

दिव्यसुधा
Last updated: June 24, 2026 4:46 pm
दिव्यसुधा
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भगवान विष्णु की पूजा करते श्रद्धालु, निर्जला एकादशी 2026 व्रत और आराधना
निर्जला एकादशी पर भगवान विष्णु की आराधना करते श्रद्धालु।
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सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व बताया गया है, लेकिन सभी एकादशियों में निर्जला एकादशी को सबसे श्रेष्ठ और पुण्यदायी माना गया है। ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली यह एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित होती है। जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट है, “निर्जला” अर्थात बिना जल के। इस दिन श्रद्धालु पूरे दिन अन्न और जल का त्याग कर भगवान विष्णु की आराधना करते हैं। यही कारण है कि इसे सबसे कठिन और सबसे फलदायी व्रतों में से एक माना जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वर्ष भर में कुल 24 एकादशियां आती हैं। यदि कोई व्यक्ति किसी कारणवश सभी एकादशियों का व्रत नहीं कर पाता, तो केवल निर्जला एकादशी का व्रत श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से उसे सभी 24 एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त होता है। यही वजह है कि इस व्रत का महत्व शास्त्रों में अत्यंत विशेष बताया गया है।

निर्जला एकादशी 2026 की तिथि और पारण समय
द्रिक पंचांग के अनुसार, एकादशी तिथि 24 जून 2026 को शाम 6 बजकर 12 मिनट पर प्रारंभ होगी और 25 जून 2026 को रात 8 बजकर 09 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार ’25 जून 2026 को निर्जला एकादशी का व्रत रखा जाएगा’। वहीं व्रत का पारण 26 जून को सुबह 5 बजकर 25 मिनट से सुबह 8 बजकर 13 मिनट के बीच किया जाएगा।

कैसे करें निर्जला एकादशी का व्रत?
निर्जला एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए और स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। घर के मंदिर में श्रीहरि विष्णु की विधिवत पूजा करें, दीपक जलाएं, तुलसी अर्पित करें और आरती करें।

जो श्रद्धालु पूर्ण रूप से व्रत करने में सक्षम हैं, वे पूरे दिन जल तक ग्रहण नहीं करते। हालांकि जिन लोगों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हैं, वे फलाहार और जल ग्रहण करके भी व्रत कर सकते हैं। शास्त्रों में व्रत की भावना और श्रद्धा को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है।

दान-पुण्य का विशेष महत्व
निर्जला एकादशी केवल उपवास का पर्व नहीं, बल्कि सेवा और दान का भी महापर्व है। इस दिन जल, अन्न, वस्त्र, फल, छाता, पंखा और जरूरतमंदों को भोजन कराने का विशेष महत्व बताया गया है। भीषण गर्मी के मौसम में प्यासे लोगों को जल पिलाना और जलदान करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन किया गया दान कई गुना फल प्रदान करता है और जीवन में सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है।

मंत्र जाप से मिलता है विशेष फल
निर्जला एकादशी पर भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है। विशेष रूप से—
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”
मंत्र का तुलसी की माला से जाप करने से मन को शांति, सकारात्मक ऊर्जा और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। इस दिन विष्णु सहस्रनाम और श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ भी अत्यंत फलदायी माना गया है।

भीमसेनी एकादशी क्यों कहलाती है?
निर्जला एकादशी को ‘भीमसेनी एकादशी’ भी कहा जाता है। इसके पीछे महाभारत काल की एक प्रसिद्ध कथा जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार पांडवों में भीमसेन भोजन के अत्यंत प्रिय थे और उनके लिए नियमित उपवास करना बहुत कठिन था। जब उन्होंने महर्षि वेदव्यास से इस समस्या का समाधान पूछा, तब वेदव्यास जी ने उन्हें वर्ष में केवल एक बार निर्जला एकादशी का व्रत रखने की सलाह दी। भीमसेन ने पूरी श्रद्धा और निष्ठा के साथ इस व्रत का पालन किया। उनके इस तप और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें सभी 24 एकादशियों के समान पुण्य प्रदान किया। तभी से यह व्रत भीमसेनी एकादशी के नाम से भी प्रसिद्ध हो गया।

निर्जला एकादशी व्रत के लाभ
निर्जला एकादशी का व्रत करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह व्रत पापों का नाश करने वाला, मन को शुद्ध करने वाला और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करने वाला माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि इसके प्रभाव से जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

निर्जला एकादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि श्रद्धा, संयम, सेवा और भगवान विष्णु के प्रति समर्पण का महान पर्व है। जो श्रद्धालु इस दिन नियम, भक्ति और विश्वास के साथ व्रत करते हैं, उन्हें आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यही कारण है कि सनातन परंपरा में निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों में सर्वोच्च स्थान दिया गया है।

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