भारत की सांस्कृतिक परंपराओं में होली रंगों, प्रेम और भाईचारे का पर्व मानी जाती है। लेकिन वाराणसी (काशी) में मनाई जाने वाली मसान होली इस उत्सव को एक गहरे आध्यात्मिक आयाम से जोड़ देती है। यहां रंगों की जगह चिता की भस्म से होली खेली जाती है एक ऐसी परंपरा जो जीवन और मृत्यु के शाश्वत सत्य को स्वीकार करने का संदेश देती है।
क्या है मसान होली?
मसान होली काशी के श्मशान घाटों, विशेषकर मणिकर्णिका घाट और हरिश्चंद्र घाट पर मनाई जाती है। यह परंपरा रंगभरी एकादशी के बाद निभाई जाती है। इस दिन अघोरी, साधु-संत और शिवभक्त चिता की भस्म को अपने शरीर पर लगाकर और हवा में उड़ाकर होली खेलते हैं। ढोल-नगाड़ों की धुन, तांडव की झलक और “हर हर महादेव” के जयकारे वातावरण को अलौकिक बना देते हैं।
भगवान शिव से मसान होली का संबंध
मसान होली का सीधा संबंध भगवान शिव से माना जाता है। शिव को ‘महाकाल’ और ‘श्मशानवासी’ कहा जाता है। भस्म उन्हें अत्यंत प्रिय है और वे जीवन-मृत्यु के पार स्थित चेतना के प्रतीक हैं। मान्यता है कि काशी में स्वयं शिव का निवास है और यहां मृत्यु को मोक्ष का द्वार माना जाता है। इसलिए यहां मृत्यु भी शोक का विषय नहीं, बल्कि आत्मा की मुक्ति का उत्सव है।
परंपरा की पौराणिक कथा
कथाओं के अनुसार, विवाह के बाद जब शिव पहली बार काशी आए, तब नगरवासियों ने रंगों से उनका स्वागत किया। उस उत्सव में देवता तो सम्मिलित हुए, परंतु शिव के प्रिय गण भूत, प्रेत, यक्ष और गंधर्व वंचित रह गए। अपने प्रत्येक भक्त को समान मानने वाले शिव ने फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष द्वादशी को मणिकर्णिका के श्मशान में अपने गणों के साथ भस्म से होली खेली। तभी से काशी में मसान होली की परंपरा प्रारंभ हुई मानी जाती है।
आध्यात्मिक महत्व
- मसान होली केवल एक अनोखी परंपरा नहीं, बल्कि एक गहन दर्शन है
- मृत्यु को स्वीकार करने का साहस
- अहंकार और देहाभिमान का त्याग
- वैराग्य और समभाव का संदेश
जीवन-मृत्यु को एक ही चक्र का भाग मानने की दृष्टि
जहां देशभर में रंग और गुलाल से होली खेली जाती है, वहीं काशी में भस्म से खेली जाने वाली यह होली हमें याद दिलाती है कि अंततः सब कुछ इसी मिट्टी और राख में विलीन हो जाता है। मसान होली हमें यह सिखाती है कि जीवन और मृत्यु विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सत्य के दो पहलू हैं। काशी की यह परंपरा संसार की नश्वरता का बोध कराते हुए आत्मा की अमरता का उत्सव मनाती है। जब पूरा देश रंगों में डूबा होता है, तब काशी के श्मशान घाट पर भस्म से खेली जाने वाली होली हमें एक गहरी आध्यात्मिक अनुभूति कराती है जहां भय नहीं, बल्कि मुक्ति का संदेश गूंजता है: हर हर महादेव