श्रावण मास का हर मंगलवार माता गौरी की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। 11 अगस्त 2026, मंगलवार को श्रावण मास का दूसरा मंगलवार है और इस दिन मंगला गौरी व्रत रखा जा रहा है। सुहागिन महिलाएं अखंड सौभाग्य, पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से माता गौरी की पूजा करती हैं। वहीं, अविवाहित कन्याएं भी अच्छे जीवनसाथी और शीघ्र विवाह की कामना से यह व्रत कर सकती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन में मंगलवार के दिन माता पार्वती की पूजा करने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। मंगला गौरी व्रत में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा का विशेष महत्व माना गया है।
मंगला गौरी व्रत की पूजा विधि
- व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजा स्थल की सफाई करके व्रत और पूजा का संकल्प लें। घर के मंदिर या किसी पवित्र स्थान पर लकड़ी की चौकी रखें और उस पर लाल या पीले रंग का कपड़ा बिछाएं।
- चौकी पर माता मंगला गौरी, भगवान शिव और श्री गणेश की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद आटे से चौमुखी दीपक बनाकर उसमें देसी घी या तिल का तेल डालें और दीपक प्रज्वलित करें।
- पूजा में माता गौरी को 16 श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें। इसमें सिंदूर, बिंदी, चूड़ियां, चुनरी, मेहंदी सहित अन्य सुहाग सामग्री शामिल की जाती है। इसके साथ 16 लौंग, 16 सुपारी, 16 इलायची, 16 चूड़ियां और 16 फूल या फल अर्पित करने की परंपरा है।
- इसके बाद माता गौरी और भगवान शिव को धूप, दीप, फल, फूल और नैवेद्य अर्पित करें। मंगला गौरी व्रत की कथा का पाठ करें या श्रद्धापूर्वक सुनें। अंत में कपूर से भगवान शिव और माता गौरी की आरती करें।
माता गौरी के मंत्र
पूजा के दौरान माता पार्वती के इस मंत्र का जाप किया जा सकता है—
“सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यंबके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥”
भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करते हुए “ॐ उमामहेश्वराय नमः” मंत्र का जाप भी किया जा सकता है।
16 संख्या का क्या है महत्व?
मंगला गौरी व्रत में 16 की संख्या को विशेष महत्व दिया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती 16 कलाओं से परिपूर्ण मानी जाती हैं। इसी कारण व्रत की पूजा में 16 श्रृंगार और कई पूजन सामग्री 16 की संख्या में अर्पित करने की परंपरा है। सुहागिन महिलाएं माता गौरी को 16 श्रृंगार अर्पित कर अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु की कामना करती हैं। सावन में किया जाने वाला यह व्रत श्रद्धा, दांपत्य सुख और परिवार की मंगलकामना से जुड़ा माना जाता है।