नई दिल्ली। महामृत्युंजय मंत्र को वेदों में “मृत्यु को जीतने वाला मंत्र” कहा गया है। यह मंत्र भगवान शिव को समर्पित है और इसे रुद्र मंत्र के रूप में भी जाना जाता है। इस महामंत्र का नियमित जप साधक को नकारात्मक ऊर्जा, रोग, भय, अकाल मृत्यु और मानसिक अशांति से मुक्ति दिलाने में सहायक होता है।
लेकिन इस मंत्र का सही प्रभाव तभी मिलता है जब इसका उच्चारण, समय और नियमों का पूरी तरह पालन किया जाए। बिना नियम के जप करना वांछित फल नहीं देता।
महामृत्युंजय मंत्र:ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ॥
अर्थ:
“हम त्रिनेत्रधारी भगवान शिव की उपासना करते हैं, जो सुगंधित हैं और सबका पोषण करते हैं। जैसे पक चुका फल बिना कष्ट के शाखा से अलग हो जाता है, वैसे ही हम मृत्यु के बंधनों से मुक्त हों, लेकिन अमरत्व को प्राप्त करें।”
महामृत्युंजय मंत्र जप के नियम:
- स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें
- पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें
- जप के लिए रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करें
- एकांत व शांत वातावरण में जप करें
- मानसिक रूप से एकाग्र रहें – मन भटकता हो तो पहले ध्यान करें
- उच्चारण स्पष्ट और शुद्ध करें – त्रुटिपूर्ण जप से हानि हो सकती है
- जप के अंत में भगवान शिव की आरती और नमः शिवाय मंत्र का जाप करें
- मंत्र जाप के बाद गाय का घी, शुद्ध जल या बिल्व पत्र चढ़ाएं
महामृत्युंजय मंत्र से होने वाले लाभ:
- रोगों से मुक्ति
- मानसिक शांति और तनाव मुक्ति
- अकाल मृत्यु से सुरक्षा
- घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह
- दीर्घायु और आरोग्य
- शत्रु बाधा से रक्षा
- आध्यात्मिक उन्नति और आत्मविश्वास में वृद्धि