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दिव्य सुधा > सनातन धर्म > भगवान > मां शैलपुत्री: नवरात्रि के प्रथम दिन पूजी जाने वाली देवी
भगवान

मां शैलपुत्री: नवरात्रि के प्रथम दिन पूजी जाने वाली देवी

दिव्यसुधा
Last updated: March 19, 2026 1:13 pm
दिव्यसुधा
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मां शैलपुत्री की पवित्र मूर्ति, वृषभ पर सवार, दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल लिए हुए।
नवरात्रि के प्रथम दिन पूजी जाने वाली मां शैलपुत्री – शक्ति, समर्पण और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक।
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नवरात्रि का पावन पर्व देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना का प्रतीक है, जिसमें प्रथम दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। “शैल” का अर्थ पर्वत और “पुत्री” का अर्थ बेटी होता है, इसलिए मां शैलपुत्री को पर्वतराज हिमालय की पुत्री कहा जाता है। उनका स्वरूप अत्यंत दिव्य, शांत और शक्तिशाली माना जाता है, जो जीवन में स्थिरता और आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करता है।

पौराणिक कथा और उत्पत्ति

मां शैलपुत्री का संबंध माता सती के पुनर्जन्म से जुड़ा हुआ है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता सती भगवान शिव की पत्नी थीं। उनके पिता राजा दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, लेकिन उन्होंने भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया। माता सती अपने पति के अपमान को सहन नहीं कर सकीं और यज्ञ की अग्नि में स्वयं को समर्पित कर दिया। इसके बाद माता सती ने पुनर्जन्म लिया और हिमालय के घर जन्मी। इस जन्म में वे शैलपुत्री के नाम से जानी गईं। उन्होंने कठोर तपस्या करके पुनः भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त किया। यह कथा नारी शक्ति, समर्पण और दृढ़ संकल्प का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करती है।

मां शैलपुत्री का स्वरूप

मां शैलपुत्री का स्वरूप अत्यंत सौम्य और प्रभावशाली है। वे वृषभ (बैल) पर सवार रहती हैं, जो धर्म और शक्ति का प्रतीक है। उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल होता है। त्रिशूल साहस, शक्ति और बुराई के नाश का प्रतीक है, जबकि कमल पवित्रता और आध्यात्मिक उन्नति को दर्शाता है। उनका यह रूप भक्तों के मन में श्रद्धा और विश्वास उत्पन्न करता है। मां शैलपुत्री को चंद्रमा से भी जोड़ा जाता है, जो मन और भावनाओं का प्रतीक है। उनकी पूजा से मानसिक शांति और संतुलन प्राप्त होता है।

पूजा विधि और महत्व

नवरात्रि के प्रथम दिन मां शैलपुत्री की विधिवत पूजा की जाती है। इस दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं और पूजा स्थल को पवित्र किया जाता है। मां की प्रतिमा या चित्र के सामने दीप जलाकर, फूल, अक्षत और गंगाजल अर्पित किया जाता है। भक्तजन विशेष रूप से घी का भोग लगाते हैं, क्योंकि यह मां को अत्यंत प्रिय माना जाता है। ऐसा करने से जीवन में सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। मां शैलपुत्री की आराधना से व्यक्ति को आत्मबल, धैर्य और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।

आध्यात्मिक महत्व

मां शैलपुत्री की पूजा का गहरा आध्यात्मिक महत्व है। वे मूलाधार चक्र का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो मानव शरीर की ऊर्जा का आधार होता है। उनकी उपासना से इस चक्र का जागरण होता है, जिससे व्यक्ति के जीवन में स्थिरता और संतुलन आता है। उनकी भक्ति से मन, बुद्धि और आत्मा शुद्ध होती है और जीवन में नई ऊर्जा का संचार होता है। मां शैलपुत्री भक्तों को कठिन परिस्थितियों में भी दृढ़ रहने की प्रेरणा देती हैं। मां शैलपुत्री न केवल देवी दुर्गा का प्रथम स्वरूप हैं, बल्कि वे शक्ति, समर्पण और अटूट विश्वास का प्रतीक भी हैं। नवरात्रि के पहले दिन उनकी पूजा से जीवन में सकारात्मकता, स्थिरता और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। उनकी कृपा से सभी बाधाएं दूर होती हैं और जीवन सुख-समृद्धि से भर जाता है। इसलिए हर भक्त को सच्चे मन से मां शैलपुत्री की आराधना करनी चाहिए।

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