नवरात्रि के चौथे दिन मां दुर्गा के चतुर्थ स्वरूप मां कूष्मांडा की पूजा का विशेष महत्व होता है। उन्हें सृष्टि की रचयिता और आदिशक्ति माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि जब चारों ओर अंधकार ही अंधकार था, तब मां कूष्मांडा ने अपनी मंद और दिव्य मुस्कान से पूरे ब्रह्मांड की रचना की। इसी कारण उनका नाम ‘कूष्मांडा’ पड़ा।
मां कूष्मांडा की आरती एक अत्यंत भक्तिमय भजन है, जिसे श्रद्धा और भक्ति के साथ गाने से देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। मान्यता है कि आरती के माध्यम से भक्त अपनी भावनाओं को देवी तक पहुंचाते हैं और उनकी कृपा से जीवन के सभी दुख और कष्ट दूर होते हैं। आरती के शब्दों में मां की महिमा, उनकी करुणा और भक्तों के प्रति उनके स्नेह का सुंदर वर्णन मिलता है।
आरती के दौरान भक्त मां से अपने कष्टों को दूर करने, सुख-समृद्धि देने और जीवन की सभी बाधाओं को समाप्त करने की प्रार्थना करते हैं। यह आरती न केवल भक्ति का माध्यम है, बल्कि यह मन को शांति और सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है।
मां कूष्मांडा देवी की आरती
कूष्मांडा जय जग सुखदानी।
मुझ पर दया करो महारानी॥
पिगंला ज्वालामुखी निराली।
शाकंबरी माँ भोली भाली॥
लाखों नाम निराले तेरे।
भक्त कई मतवाले तेरे॥
भीमा पर्वत पर है डेरा।
स्वीकारो प्रणाम ये मेरा॥
सबकी सुनती हो जगदंबे।
सुख पहुँचती हो माँ अंबे॥
तेरे दर्शन का मैं प्यासा।
पूर्ण कर दो मेरी आशा॥
माँ के मन में ममता भारी।
क्यों ना सुनेगी अरज हमारी॥
तेरे दर पर किया है डेरा।
दूर करो माँ संकट मेरा॥
मेरे कारज पूरे कर दो।
मेरे तुम भंडारे भर दो॥
तेरा दास तुझे ही ध्याए।
भक्त तेरे दर शीश झुकाए॥
आरती का महत्व
मां कूष्मांडा की आरती करने से भक्तों के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह आरती न केवल आध्यात्मिक शांति प्रदान करती है, बल्कि जीवन में सुख, समृद्धि और सफलता के मार्ग भी खोलती है। नवरात्रि के चौथे दिन इस आरती का पाठ करने से मां की विशेष कृपा प्राप्त होती है और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।