सनातन परंपरा में भगवान विष्णु के कच्छप (कूर्म) अवतार का विशेष महत्व माना गया है। यह अवतार हमें धैर्य, संतुलन और कर्तव्यनिष्ठा का संदेश देता है। जब समुद्र मंथन के समय मंदराचल पर्वत डूबने लगा, तब भगवान विष्णु ने कच्छप रूप धारण कर अपनी पीठ पर उसे संभाला और सृष्टि के संतुलन को बनाए रखा। इसी दिव्य लीला की स्मृति में भक्त कूर्म भगवान की आरती गाते हैं, जो जीवन में शांति, सुख और समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करती है।
कूर्म भगवान की आरती
ॐ जय कच्छप भगवान, प्रभु जय कूर्म भगवान।
तुम बिन सूने काज सब, तुम बिन व्याकुल प्रान॥
ॐ जय कच्छप भगवान…
क्षीरसिंधु में प्रकट भए, हरि अवतार धरत।
मंदर पर्वत पीठ धरयो, सब विधि काज सरत॥
ॐ जय कच्छप भगवान…
देव असुर मिलि मंथन कियो, कीन्हों सुमेरु दंड।
वासुकि नेति बनाइ कै, मथे सब ब्रह्मांड॥
ॐ जय कच्छप भगवान…
अमृत कलश निकारि कै, हरि सब दुख हरत।
निर्मल कीन्हों जगत को, अमृत पान करत॥
ॐ जय कच्छप भगवान…
कर्मयोग के तुम धनी, मति-गति के आधार।
कूर्म रूप धरि विष्णुजी, कीन्हों भव निस्तार॥
ॐ जय कच्छप भगवान…
जो नर कूर्म अवतार की, आरती निति गावत।
ब्रह्मानंद स्वरूप प्रभु, सो सुख संपत्ति पावत॥
ॐ जय कच्छप भगवान, प्रभु जय कूर्म भगवान।
तुम बिन सूने काज सब, तुम बिन व्याकुल प्रान॥
ॐ जय कच्छप भगवान…
यह आरती श्रद्धा और भक्ति भाव से करने पर भगवान विष्णु के कूर्म अवतार की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होकर सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।