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दिव्य सुधा > आरती/मंत्र > कुंभ संक्रांति और विजया एकादशी का दुर्लभ संयोग: भक्ति, विजय और ऊर्जा का दिन
आरती/मंत्र

कुंभ संक्रांति और विजया एकादशी का दुर्लभ संयोग: भक्ति, विजय और ऊर्जा का दिन

Ekta Mishra
Last updated: February 13, 2026 2:05 pm
Ekta Mishra
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कुंभ संक्रांति और विजया एकादशी पर सूर्य देव को अर्घ्य और भगवान विष्णु की पूजा
विजया एकादशी और कुंभ संक्रांति: विष्णु कृपा और सूर्य आशीर्वाद का शुभ दिन
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आज फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि अत्यंत विशेष मानी जा रही है, क्योंकि इसी दिन सूर्य भगवान मकर राशि से निकलकर कुंभ राशि में प्रवेश कर रहे हैं। इस प्रकार कुंभ संक्रांति और विजया एकादशी का दुर्लभ संयोग बना है। एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित होती है, जबकि संक्रांति के दिन सूर्य देव की पूजा का विधान बताया गया है। सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश को संक्रांति कहा जाता है। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को ग्रहों का राजा माना गया है, इसलिए आज का दिन कुंडली में सूर्य को मजबूत करने और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करने के लिए अत्यंत शुभ अवसर है।

इस पावन दिन भक्तों को भगवान विष्णु और सूर्य देव दोनों की उपासना का अवसर प्राप्त हो रहा है। श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत, जप और दान करने से जीवन में विजय, आत्मबल और प्रकाश का संचार होता है।

विजया एकादशी व्रत कथा और उसका महत्व
पौराणिक कथा के अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से विजया एकादशी का महत्व पूछा था। तब श्रीकृष्ण ने बताया कि इस व्रत की महिमा स्वयं ब्रह्माजी ने देवर्षि नारद को सुनाई थी। त्रेतायुग में जब रावण माता सीता का हरण कर उन्हें लंका ले गया, तब भगवान श्रीराम अपनी वानर सेना के साथ समुद्र तट पर पहुंचे। समुद्र को पार करना अत्यंत कठिन प्रतीत हो रहा था।

तब लक्ष्मण जी ने एक महान ऋषि के आश्रम में जाकर मार्गदर्शन लेने का सुझाव दिया। ऋषि ने भगवान श्रीराम को फाल्गुन कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। श्रीराम ने पूर्ण श्रद्धा और विधि-विधान से यह व्रत किया। व्रत के प्रभाव से समुद्र पार करने का मार्ग प्रशस्त हुआ और अंततः रावण पर विजय प्राप्त कर माता सीता को मुक्त कराया गया।

इसी कारण इस एकादशी को “विजया” एकादशी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत करने और कथा सुनने से शत्रु बाधाएं कमजोर होती हैं तथा जीवन में सफलता और विजय प्राप्त होती है।

कुंभ संक्रांति पर क्या करें?
कुंभ संक्रांति के दिन प्रातःकाल स्नान का विशेष महत्व है। यदि संभव हो तो किसी पवित्र नदी में स्नान करें, अन्यथा घर पर ही स्नान के जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करना भी शुभ माना गया है। स्नान के बाद तांबे के लोटे में जल, लाल पुष्प और अक्षत डालकर सूर्य भगवान को अर्घ्य दें। इससे आत्मविश्वास बढ़ता है और कार्यक्षेत्र में उन्नति के योग बनते हैं।

इस दिन दान का भी विशेष महत्व है। जरूरतमंदों को तिल, गुड़, अनाज या गर्म वस्त्र दान करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। पितरों के निमित्त दान करने से पारिवारिक शांति और आशीर्वाद प्राप्त होता है। साथ ही आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करने से मानसिक शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि होती है।

कुंभ संक्रांति पर क्या न करें?
इस पावन दिन सात्विक आहार ग्रहण करें। मांस, मदिरा, लहसुन और प्याज का सेवन करने से बचें। वाणी में मधुरता रखें और किसी भी प्रकार के विवाद से दूर रहें। सूर्योदय के बाद तक सोना शुभ नहीं माना जाता, इसलिए प्रातःकाल शीघ्र उठकर पूजा-पाठ करना उत्तम होता है। साथ ही किसी भी प्रकार के नशे से दूर रहें, क्योंकि इससे सूर्य की शुभता कमजोर हो सकती है।

यह दुर्लभ संयोग हमें संयम, भक्ति और आत्मशक्ति का संदेश देता है। यदि श्रद्धा और नियमपूर्वक उपासना की जाए, तो भगवान विष्णु और सूर्य देव दोनों की कृपा से जीवन में विजय, समृद्धि और प्रकाश का मार्ग प्रशस्त होता है।

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