काशी के कोतवाल भैरव बाबा की अद्भुत कथा ,धर्म, तंत्र और रहस्यमयी शक्तियों की नगरी काशी (वाराणसी) में एक ऐसे देवता विराजमान हैं जिन्हें इस पवित्र शहर का “कोतवाल” यानी रक्षक और न्यायाधीश माना जाता है—ये हैं काल भैरव बाबा। मान्यता है कि काशी में प्रवेश करने वाला हर व्यक्ति इनके अधीन आता है, और बिना इनके दर्शन के काशी यात्रा अधूरी मानी जाती है।
उत्पत्ति की रहस्यमयी कथा
भैरव बाबा की उत्पत्ति का संबंध स्वयं भगवान शिव से जुड़ा हुआ है। पुराणों के अनुसार एक बार सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा को अपने ज्ञान और सृजन पर अत्यधिक अहंकार हो गया। वे स्वयं को सर्वोच्च मानने लगे और उन्होंने शिवजी का अपमान भी कर दिया। यह देखकर भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए। उनके क्रोध से एक भयंकर और तेजस्वी रूप प्रकट हुआ—काल भैरव। उनका स्वरूप अत्यंत उग्र था, हाथ में त्रिशूल और खप्पर, गले में मुंडमाला और आँखों में अग्नि जैसी ज्वाला।
ब्रह्मा का अहंकार चूर्ण
काल भैरव ने ब्रह्मा के अहंकार को समाप्त करने के लिए उनके पाँचवें सिर को काट दिया। जैसे ही यह हुआ, भैरव बाबा को “ब्रह्महत्या दोष” लग गया, क्योंकि ब्रह्मा एक देवता थे। उस कटे हुए सिर (कपाल) को लेकर भैरव तीनों लोकों में भटकने लगे। यह अवस्था “भिक्षाटन” कहलाती है, जिसमें वे भिक्षा मांगते हुए अपने पाप से मुक्ति की तलाश करते हैं। लेकिन कहीं भी उन्हें इस दोष से छुटकारा नहीं मिला।
काशी में मुक्ति
जब भटकते-भटकते काल भैरव वाराणसी पहुँचे, तो जैसे ही उन्होंने इस पवित्र भूमि पर कदम रखा, उनके हाथ से ब्रह्मा का कपाल स्वतः गिर गया और उन्हें ब्रह्महत्या दोष से मुक्ति मिल गई। यही स्थान “कपाल मोचन” के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस घटना के बाद भगवान शिव ने भैरव को काशी का कोतवाल नियुक्त किया। तब से मान्यता है कि काशी में हर जीव—चाहे देव हो या मानव—सबको भैरव बाबा के नियमों का पालन करना पड़ता है।
काशी के कोतवाल होने के नाते भैरव बाबा का कार्य है—
- काशी की रक्षा करना
- पाप और अधर्म करने वालों को दंड देना
- भक्तों की रक्षा करना
- न्याय करना और कर्मों का फल देना
कहा जाता है कि जो व्यक्ति काशी में गलत कार्य करता है, उसे भैरव बाबा स्वयं दंडित करते हैं। वहीं जो सच्चे मन से भक्ति करता है, उसकी हर मनोकामना पूरी होती है।
भैरव का वाहन
भैरव बाबा का वाहन कुत्ता (श्वान) है, जो वफादारी और सतर्कता का प्रतीक है। काशी में आज भी भैरव मंदिर के आसपास कुत्तों को भोजन कराना पुण्य कार्य माना जाता है। यह विश्वास है कि ऐसा करने से भैरव बाबा प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। काशी में स्थित काल भैरव मंदिर अत्यंत प्राचीन और शक्तिशाली माना जाता है। यहाँ भक्त विशेष रूप से—
- काली मिर्च
- सरसों का तेल
- काले वस्त्र
अर्पित करते हैं। मान्यता है कि इससे शनि, राहु-केतु और तंत्र बाधाएं दूर होती हैं। भैरव बाबा की पूजा विशेष रूप से रविवार और मंगलवार को की जाती है, और “काल भैरव अष्टमी” के दिन यहाँ अपार भीड़ उमड़ती है।
तंत्र और भैरव साधना
काल भैरव को तंत्र साधना का अधिपति भी माना जाता है। तांत्रिक साधनाओं में भैरव की विशेष भूमिका होती है। कहा जाता है कि जो साधक भैरव की कृपा प्राप्त कर लेता है, उसे किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता। भैरव बाबा अंधकार, भय और नकारात्मक शक्तियों के स्वामी हैं, इसलिए वे इन सभी पर नियंत्रण रखते हैं। यही कारण है कि उन्हें “रक्षक देव” भी कहा जाता है।
काशी में भैरव का आध्यात्मिक रहस्य
काशी केवल एक शहर नहीं, बल्कि मोक्ष की नगरी है। यहाँ मृत्यु भी उत्सव मानी जाती है, और कहा जाता है कि काशी में प्राण त्यागने वाले को मोक्ष मिलता है। इस पूरी प्रक्रिया में भैरव बाबा का महत्वपूर्ण स्थान है। मान्यता है कि मृत्यु के बाद आत्मा को भैरव बाबा के सामने प्रस्तुत होना पड़ता है, जहाँ वे उसके कर्मों का लेखा-जोखा देखते हैं और फिर आगे की दिशा तय करते हैं।
भक्तों के अनुभव और आस्था
कई भक्तों का मानना है कि भैरव बाबा अत्यंत शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता हैं। जो व्यक्ति सच्चे मन से उनकी आराधना करता है, उसकी रक्षा स्वयं भैरव करते हैं। कई लोगों ने अपने जीवन में भैरव बाबा की कृपा से चमत्कारी परिवर्तन अनुभव किए हैं।
निष्कर्ष
काशी के कोतवाल काल भैरव केवल एक देवता नहीं, बल्कि न्याय, सुरक्षा और धर्म के प्रतीक हैं। उनकी कथा हमें यह सिखाती है कि अहंकार का अंत निश्चित है और सच्चाई व धर्म की जीत होती है। काशी की यात्रा तभी पूर्ण मानी जाती है जब भक्त काल भैरव के दर्शन करता है, क्योंकि वे इस पवित्र नगरी के द्वारपाल हैं। उनकी कृपा से ही काशी में रहना और मोक्ष प्राप्त करना संभव है। इसलिए जब भी आप काशी जाएं, तो पहले भैरव बाबा के दरबार में जाकर आशीर्वाद अवश्य लें—क्योंकि बिना कोतवाल की अनुमति, इस नगरी में कुछ भी संभव नहीं।