हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत का खास महत्व है। यह व्रत ज्येष्ठ माह की अमावस्या को रखा जाता है। उत्तर भारत में महिलाएं यह व्रत अमावस्या से एक दिन पहले करती हैं, जबकि महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत में इसे उत्तर भारत में पड़ने वाली तिथि के 15 दिन बाद की तिथि पर रखा जाता है। इस दिन वट यानी बरगद के पेड़ की पूजा करना जरूरी होता है क्योंकि मान्यता है कि इस पेड़ में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवताओं का वास होता है। यदि आप भी यह व्रत करने जा रहीं हैं, तो यह आर्टिकल आपके लिए ही है।
शुभ मुहूर्त
वैदिक कैलेंडर के अनुसार, 2025 में ज्येष्ठ माह की अमावस्या 26 मई को रात 12 बजकर 11 मिनट से शुरू होगी और 27 मई को सुबह 8 बजकर 31 बजे तक समाप्त होगी। इसलिए, वट सावित्री व्रत 26 मई को ही मनाया जाएगा। इस दिन सोमवती अमावस्या भी मनाई जाएगी।
वट सावित्री व्रत के नियम
- इस दिन महिलाएं निर्जल उपवास करती हैं, इसलिए व्रत से पहले शरीर का ध्यान रखना जरूरी है।
- व्रत के दौरान सोच सकारात्मक रखें और मन को भक्ति में लगाएं।
- किसी से नकारात्मक या बुरी बातें न कहें, शांति और प्रेम बनाए रखें।
- परिवार के बुजुर्गों का आशीर्वाद लें, यह शुभ और ऊर्जा देने वाला होता है।
- लाल रंग के कपड़े पहनें और सोलह श्रृंगार करके पूजा में शामिल हों।
- व्रत के दिन पति से बहस या विवाद से दूर रहें, उन्हें सम्मान दें।
- मांसाहार, प्याज-लहसुन जैसे तामसिक भोजन से पूरी तरह बचें।