हर वर्ष आषाढ़ मास में निकलने वाली भगवान जगन्नाथ की भव्य रथयात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि प्रेम, विरह, मान-मनुहार और पुनर्मिलन की दिव्य लीलाओं का अद्भुत प्रतीक भी है। इस रथयात्रा से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं, लेकिन इनमें सबसे रोचक कथा हेरा पंचमी की मानी जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी दिन माता लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ से रुष्ट होकर उनके रथ नंदीघोष का एक हिस्सा प्रतीकात्मक रूप से क्षतिग्रस्त कर देती हैं। वर्ष 2026 में हेरा पंचमी 20 जुलाई, सोमवार को मनाई जाएगी।
भगवान जगन्नाथ के बिना क्यों नाराज हुईं माता लक्ष्मी?
पुरी की प्राचीन परंपरा के अनुसार, भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर की यात्रा पर निकलते हैं। इस यात्रा को भगवान की मौसी के घर जाने का प्रतीक माना जाता है। इस दौरान माता लक्ष्मी श्रीमंदिर में ही विराजमान रहती हैं और रथयात्रा में शामिल नहीं होतीं। जब कई दिनों तक भगवान जगन्नाथ वापस नहीं लौटते, तब माता लक्ष्मी उन्हें वापस लाने के लिए गुंडिचा मंदिर की ओर प्रस्थान करती हैं। धार्मिक मान्यता है कि उनकी नाराजगी रथयात्रा में शामिल न किए जाने से अधिक, भगवान से लंबे समय तक दूर रहने के कारण थी।
जब माता लक्ष्मी ने तोड़ा भगवान जगन्नाथ का रथ
पौराणिक कथा के अनुसार, जब माता लक्ष्मी गुंडिचा मंदिर पहुंचती हैं, तब भगवान जगन्नाथ तुरंत उनके साथ लौटने के बजाय कुछ समय बाद वापस आने का आश्वासन देते हैं। इससे माता लक्ष्मी मान जाती हैं, लेकिन अपने प्रेमपूर्ण मान और नाराजगी को व्यक्त करते हुए भगवान जगन्नाथ के रथ नंदीघोष का एक हिस्सा प्रतीकात्मक रूप से क्षतिग्रस्त कर देती हैं। इसी घटना को सामान्य रूप से “रथ तोड़ने” की परंपरा कहा जाता है। इसके बाद माता लक्ष्मी मुख्य मार्ग से वापस नहीं लौटतीं, बल्कि एक गुप्त मार्ग से श्रीमंदिर पहुंचती हैं। यह पूरी घटना क्रोध का नहीं, बल्कि दांपत्य प्रेम, विरह और पुनर्मिलन की दिव्य लीला मानी जाती है।
हेरा पंचमी का धार्मिक महत्व
आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला हेरा पंचमी अनुष्ठान आज भी पुरी की जगन्नाथ परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस दिन माता लक्ष्मी की उत्सव मूर्ति को विधि-विधान के साथ गुंडिचा मंदिर ले जाया जाता है, जहां इस पौराणिक प्रसंग का प्रतीकात्मक मंचन किया जाता है। हजारों श्रद्धालु इस अनुष्ठान के दर्शन करते हैं और इसे प्रेम, समर्पण, मान-मनुहार तथा पारिवारिक संबंधों की दिव्य अभिव्यक्ति के रूप में देखते हैं।
मंदिर परंपराओं के अनुसार, बाद में भगवान जगन्नाथ माता लक्ष्मी को प्रसन्न करते हैं और उनके मान का सम्मान करते हुए श्रीमंदिर लौटते हैं। यही कारण है कि हेरा पंचमी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह संदेश भी देती है कि प्रेम में रूठना-मनाना भी रिश्तों की मधुरता का हिस्सा है। यही दिव्य परंपरा सदियों से आज तक श्रद्धा और भक्ति के साथ निभाई जा रही है।