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दिव्य सुधा > सनातन धर्म > भगवान > जहाँ हृदय में बसते हैं राम: हनुमान की परम श्रद्धा का रहस्य
भगवान

जहाँ हृदय में बसते हैं राम: हनुमान की परम श्रद्धा का रहस्य

दिव्यसुधा
Last updated: February 25, 2026 11:28 am
दिव्यसुधा
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हनुमान जी अपना वक्षस्थल चीरकर हृदय में श्रीराम और सीता का दर्शन कराते हुए
हनुमान जी की भक्ति केवल श्रद्धा नहीं, बल्कि पूर्ण आत्म-समर्पण और धर्म के प्रति अटूट निष्ठा का प्रतीक है।
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हनुमान जी का श्रीराम के प्रति परम भक्त बनना कोई एक क्षणिक भावना नहीं था, बल्कि वह एक दिव्य पहचान, आत्मिक जागरण और धर्म के प्रति समर्पण की महान प्रक्रिया थी। इस प्रसंग का विस्तृत वर्णन दो प्रमुख ग्रंथों—वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस—में मिलता है। दोनों ही ग्रंथ इस मिलन को केवल ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि भक्ति के आदर्श स्वरूप के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

दिव्य मिलन की भूमिका

जब श्रीराम अपनी पत्नी सीता की खोज में अपने भ्राता लक्ष्मण के साथ वन-वन भटक रहे थे, तब वे ऋष्यमूक पर्वत के समीप पहुँचे। उस समय वानरराज सुग्रीव अपने भाई बाली के भय से वहीं निवास कर रहे थे। सुग्रीव ने जब दूर से दो तेजस्वी पुरुषों को आते देखा, तो उन्हें शंका हुई कि कहीं वे बाली द्वारा भेजे गए योद्धा न हों। इसलिए उन्होंने अपने सबसे बुद्धिमान और नीति-कुशल मंत्री हनुमान को उनके पास भेजा।

पहचान का क्षण

हनुमान जी ब्राह्मण का रूप धारण कर श्रीराम और लक्ष्मण के समीप पहुँचे। उन्होंने अत्यंत विनम्रता और मधुर वाणी में उनसे परिचय पूछा। वाल्मीकि रामायण में वर्णन मिलता है कि हनुमान की वाणी सुनकर श्रीराम लक्ष्मण से कहते हैं कि यह वानर अवश्य ही अत्यंत विद्वान और वेदों का ज्ञाता है, क्योंकि इसकी वाणी में न तो अशुद्धि है और न ही अहंकार। जब श्रीराम ने अपना परिचय दिया और सीता-हरण की कथा सुनाई, तब हनुमान का हृदय भाव-विह्वल हो उठा। रामचरितमानस में तुलसीदास जी इस क्षण का अत्यंत भावपूर्ण चित्रण करते हैं—

“प्रभु पहचानि परेउ पगु धाए।
हरषि हृदयँ नयन जल छाए॥”

अर्थात् जैसे ही हनुमान ने प्रभु को पहचाना, वे उनके चरणों में गिर पड़े और आनंद के आँसू बहने लगे। यही वह क्षण था जब सेवक और स्वामी का संबंध स्थापित हुआ। यह केवल औपचारिक भेंट नहीं थी, बल्कि आत्मा का अपने आराध्य से मिलन था।

सेवा का संकल्प

पहचान के बाद हनुमान जी ने स्वयं को श्रीराम का दास घोषित किया। उन्होंने सुग्रीव और श्रीराम की मित्रता करवाई, जिससे आगे चलकर धर्म की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ। वाल्मीकि रामायण में उल्लेख है कि हनुमान ने इस मित्रता को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह भक्ति केवल भावनात्मक नहीं थी; यह कर्मयोग से जुड़ी हुई थी। हनुमान की भक्ति की विशेषता यह थी कि उसमें अहंकार का लेशमात्र भी स्थान नहीं था। वे अपनी शक्ति, बुद्धि और पराक्रम को कभी अपना नहीं मानते थे; वे सब कुछ श्रीराम की कृपा का फल समझते थे। यही सच्ची भक्ति का लक्षण है।

सीता की खोज और अद्भुत पराक्रम

जब सीता की खोज का कार्य आरंभ हुआ और वानर-सेना समुद्र तट पर पहुँची, तब सभी के सामने विशाल सागर पार करने की चुनौती थी। जाम्बवन्त ने हनुमान को उनकी शक्ति का स्मरण कराया। तत्पश्चात हनुमान ने समुद्र लांघकर लंका पहुँचने का अद्वितीय साहसिक कार्य किया। वाल्मीकि रामायण में इस प्रसंग का अत्यंत विस्तृत वर्णन है। लंका पहुँचकर उन्होंने अशोक वाटिका में सीता जी को खोजा और उन्हें श्रीराम की अंगूठी देकर विश्वास दिलाया कि वे शीघ्र ही उन्हें मुक्त कराने आएंगे। यह कार्य केवल शारीरिक बल का नहीं, बल्कि अटूट विश्वास और निष्ठा का प्रतीक था।

लंका दहन और धर्म की स्थापना

जब रावण के सैनिकों ने हनुमान को बंदी बनाकर उनकी पूँछ में अग्नि लगाई, तब उन्होंने उसी अग्नि को धर्म के शस्त्र में बदल दिया। उन्होंने लंका को जलाकर यह संदेश दिया कि अधर्म का अंत निश्चित है। रामचरितमानस में यह प्रसंग भक्ति और वीरता के अद्भुत संगम के रूप में प्रस्तुत हुआ है।हनुमान का यह पराक्रम व्यक्तिगत क्रोध नहीं था; वह श्रीराम के कार्य की सिद्धि के लिए किया गया धर्मयुद्ध था। उनकी हर क्रिया में प्रभु-सेवा का भाव स्पष्ट दिखाई देता है।

भक्ति का चरम स्वरूप

हनुमान जी की भक्ति का सबसे मार्मिक चित्र तब सामने आता है जब वे अपना वक्षस्थल चीरकर दिखाते हैं कि उनके हृदय में श्रीराम और सीता का वास है। यह घटना प्रतीकात्मक है—यह दर्शाती है कि उनकी भक्ति बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि अंतरात्मा की अनुभूति थी।रामचरितमानस और वाल्मीकि रामायण दोनों ही ग्रंथों में हनुमान को केवल एक वीर योद्धा के रूप में नहीं, बल्कि आदर्श भक्त, बुद्धिमान दूत और विनम्र सेवक के रूप में चित्रित किया गया है। उनकी भक्ति में ज्ञान, कर्म और प्रेम—तीनों का अद्भुत समन्वय है।

हनुमान जी का श्रीराम के प्रति परम भक्त बनना एक दिव्य मिलन से आरंभ हुआ, परंतु वह मिलन समय के साथ अटूट समर्पण में परिवर्तित हो गया। वाल्मीकि रामायण उन्हें बुद्धि और नीति का प्रतीक बताती है, जबकि रामचरितमानस उन्हें प्रेम और समर्पण का आदर्श रूप में प्रस्तुत करती है। इन दोनों संदर्भों से स्पष्ट होता है कि हनुमान की भक्ति केवल श्रद्धा नहीं, बल्कि संपूर्ण आत्म-समर्पण थी। इसीलिए वे “रामभक्त हनुमान” कहलाते हैं—ऐसे भक्त जिनकी हर श्वास, हर विचार और हर कर्म केवल अपने आराध्य श्रीराम की सेवा के लिए समर्पित था। उनकी भक्ति आज भी भक्तों के लिए आदर्श, प्रेरणा और विश्वास का स्रोत बनी हुई है।

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