भारत का दीपावली त्योहार केवल एक पर्व नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, धर्म और आध्यात्मिकता का प्रतीक भी है। दीपावली अंधकार पर प्रकाश की जीत, बुराई पर अच्छाई की विजय और भगवान राम के अयोध्या वापसी के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इस साल, यूनेस्को ने दीपावली को अपनी अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल किया, जो भारत की सांस्कृतिक धरोहर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाने वाला महत्वपूर्ण कदम है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस घोषणा को सोशल मीडिया पर साझा किया और इसे भारतीय संस्कृति के लिए गर्व का क्षण बताया। यूनेस्को ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर लिखा कि दीपावली पूरे भारत में विभिन्न समुदायों द्वारा मनाया जाने वाला प्रकाश पर्व है। यह त्योहार वर्ष की अंतिम फसल, नए साल और नए मौसम की शुरुआत का प्रतीक भी है।
दीपावली का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व
दीपावली सिर्फ रोशनी का पर्व नहीं है। यह त्योहार आध्यात्मिक जागरूकता, परिवार और समाज में एकता, और अच्छाई पर विश्वास को बढ़ावा देता है। इस दिन लोग अपने घरों को साफ-सुथरा और सजाते हैं, दीयों और मोमबत्तियों से घर और आस-पास के वातावरण को जगमगाते हैं। आतिशबाजी और रंग-बिरंगे लाइट डेकोरेशन त्योहार को और भी खास बनाते हैं। यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत लिस्ट में शामिल होने के साथ ही दीपावली का वैश्विक महत्व बढ़ जाएगा। यह ना केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी इसे मनाने वाले भारतीयों के लिए गर्व का विषय बनेगा।
अमूर्त सांस्कृतिक विरासत क्या है?
यूनेस्को के अनुसार, अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में उन प्रथाओं, ज्ञान, अभिव्यक्तियों, वस्तुओं और स्थानों को शामिल किया गया है, जिन्हें कोई समुदाय अपनी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा मानता है। यह विरासत पीढ़ियों से चली आ रही होती है, विकसित होती है और अपनी सांस्कृतिक पहचान को सुदृढ़ करती है। इस सूची में शामिल होने से दीपावली को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलेगी, जिससे इसकी वैश्विक लोकप्रियता और बढ़ेगी। इससे भारत की संस्कृति और आध्यात्मिकता के वैश्विक प्रचार-प्रसार में मदद मिलेगी।
लाल किले पर दीयों की रोशनी
यूनेस्को की घोषणा के बाद दिल्ली में भी दिवाली की तैयारियां पूरी हो गई हैं। लाल किले पर इस बार विशेष रूप से दीयों की रोशनी जलाई जाएगी। शहर के चौक-चौराहों पर दीपावली बाजार सजाए गए हैं और मेले व आतिशबाजी से पूरा माहौल दिव्य और उत्सवपूर्ण होगा। इस आयोजन से दीपावली की भव्यता और वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठा बढ़ेगी। विदेशों में रह रहे भारतीय भी अपने त्योहार पर गर्व महसूस करेंगे।
वैश्विक स्तर पर दीपावली का महत्व
दीपावली को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत लिस्ट में शामिल करने से न केवल भारत की सांस्कृतिक पहचान सुदृढ़ होगी, बल्कि यह त्योहार विश्व स्तर पर भी एक साझा उत्सव बन जाएगा। इसे देखकर अन्य देशों के लोग भी इसके धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व को समझ पाएंगे। विश्व स्तर पर मान्यता मिलने से दीपावली का आयोजन और भी भव्य और व्यवस्थित तरीके से किया जाएगा। इससे पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा और भारत आने वाले अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों की संख्या में वृद्धि होगी।
पर्यटन और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
दीपावली की वैश्विक मान्यता के साथ पर्यटन बढ़ेगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ मिलेगा। मंदिर, बाजार, मेले और आतिशबाजी जैसी गतिविधियाँ न केवल पर्यटन को आकर्षित करेंगी, बल्कि स्थानीय व्यापार और रोजगार के अवसर भी बढ़ाएंगी। यूनेस्को की मदद से इस त्योहार से जुड़ी परंपराओं का संरक्षण और प्रचार-प्रसार होगा।
अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक आदान-प्रदान
यूनेस्को की सूची में शामिल होने से दीपावली अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक आदान-प्रदान का माध्यम बनेगा। अन्य देशों के लोग भी भारतीय त्योहार की परंपराओं को सीखेंगे और इसे अपनाएंगे। इसके माध्यम से भारतीय संस्कृति का वैश्विक स्तर पर प्रचार और संरक्षण संभव होगा।
दीपावली से जुड़ी परंपराएँ और ज्ञान
दीपावली की परंपराएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही हैं। इस लिस्ट में शामिल होने के बाद इन परंपराओं का अध्ययन और प्रचार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक बढ़ेगा। बच्चों और युवाओं को भी भारतीय संस्कृति की गहरी समझ और आध्यात्मिक ज्ञान मिलेगा।
दुनिया में दीपावली का उत्सव
अब दुनिया के विभिन्न हिस्सों में लोग दीपावली के महत्व को जान पाएंगे। विदेशी नागरिक और भारतीय प्रवासी इस त्योहार को गर्व और भव्यता के साथ मनाएंगे। भारत के अन्य सांस्कृतिक उत्सवों की तरह दीपावली भी वैश्विक मंच पर अपनी पहचान बनाएगी।
दिवाली का वैश्विक और धार्मिक महत्व
योग, कुंभ और दुर्गा पूजा जैसे त्योहारों की तरह, दीपावली भी भारतीय संस्कृति की आत्मा को वैश्विक मंच पर नया आयाम देगी। यह केवल एक देश का त्योहार नहीं रह जाएगा, बल्कि पूरी मानवता के लिए सांस्कृतिक साझा उत्सव बन जाएगा।
पूर्व में अमूर्त सांस्कृतिक विरासत लिस्ट में शामिल भारतीय त्योहार
भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाने के लिए यूनेस्को ने अनेक महत्वपूर्ण पर्वों और परंपराओं को अपनी अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल किया है। इसमें साल 2024 में मनाया गया नवरोज पर्व, साल 2023 में गुजरात का गरबा, साल 2021 में कोलकाता की दुर्गा पूजा, साल 2017 में कुंभ मेला, साल 2016 में योग, और साल 2014 में पंजाब के जंडियाला गुरु के ठठेरों के बीच पारंपरिक पीतल व तांबे के बर्तन बनाने की कला को शामिल किया गया। इसके अलावा, साल 2008 में रामलीला को भी यूनेस्को की इस प्रतिष्ठित सूची में जगह मिली। ये सभी त्योहार और परंपराएँ न केवल भारत की सांस्कृतिक विविधता और आध्यात्मिकता को दर्शाते हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।