हिंदू धर्म में भीष्म द्वादशी का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। यह पावन तिथि माघ माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को मनाई जाती है और इसका संबंध महाभारत के महान योद्धा पितामह भीष्म से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि इस दिन व्रत, स्नान, तर्पण और दान करने से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है, आरोग्य की प्राप्ति होती है और भगवान विष्णु की कृपा से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। कई स्थानों पर इसे तिल द्वादशी या भीष्म एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
भीष्म द्वादशी 2026 की तिथि
पंचांग के अनुसार माघ शुक्ल द्वादशी तिथि का आरंभ 29 जनवरी 2026 को दोपहर 1 बजकर 55 मिनट से होगा और इसका समापन 30 जनवरी 2026, शुक्रवार को सुबह 11 बजकर 09 मिनट पर होगा। उदया तिथि के अनुसार भीष्म द्वादशी 29 जनवरी 2026 को मनाई जाएगी।
भीष्म द्वादशी का शुभ मुहूर्त
इस दिन शुभ पूजा समय दोपहर 12 बजकर 13 मिनट से 12 बजकर 56 मिनट तक रहेगा। पितरों के लिए तर्पण और श्राद्ध कर्म का उत्तम समय सुबह 11 बजकर 03 मिनट से दोपहर 02 बजकर 30 मिनट तक माना गया है। इस दिन इंद्र योग प्रातःकाल से रात 08 बजकर 27 मिनट तक रहेगा तथा मृगशिरा नक्षत्र सुबह 07 बजकर 31 मिनट से अगले दिन सुबह 05 बजकर 29 मिनट तक प्रभावी रहेगा, जो इसे और भी पुण्यदायी बनाता है।
भीष्म द्वादशी का धार्मिक महत्व
पौराणिक मान्यता के अनुसार पितामह भीष्म ने माघ शुक्ल अष्टमी को अपने प्राण त्यागे थे, जिसे भीष्म अष्टमी कहा जाता है। इसके बाद पांडवों ने द्वादशी तिथि को उनका तर्पण और श्राद्ध किया, तभी से यह तिथि भीष्म द्वादशी के नाम से प्रसिद्ध हुई। इस दिन किए गए तर्पण से पितर तृप्त होते हैं और परिवार को अपना आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
भीष्म द्वादशी पर विशेष रूप से तिल का प्रयोग किया जाता है। स्नान, उबटन, भोजन और दान में तिल का उपयोग अत्यंत शुभ माना गया है। शास्त्रों में वर्णित है कि जो व्यक्ति इस दिन व्रत रखकर तिल का दान करता है, उसे सौ वाजपेय यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। यह व्रत पितृ दोष निवारण, रोग मुक्ति और पारिवारिक सुख-शांति के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना गया है।
भीष्म द्वादशी पर क्या करें
इस दिन प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु का ध्यान करें, पितरों के निमित्त तर्पण अर्पित करें और सामर्थ्य अनुसार तिल, वस्त्र या अन्न का दान करें। श्रद्धा भाव से किया गया छोटा सा दान भी जीवन में बड़ी सकारात्मकता ला सकता है। भीष्म द्वादशी हमें यह संदेश देती है कि पितरों का सम्मान और स्मरण करने से जीवन में सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।