उत्तर भारत में होली को रंगों का महापर्व कहा जाता है, लेकिन ब्रज क्षेत्र मथुरा, वृंदावन, बरसाना और नंदगांव की होली आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष महत्व रखती है। यहां होली का उत्सव लगभग 40 दिनों तक चलता है, जिसमें राधा-कृष्ण की विभिन्न लीलाओं का स्मरण किया जाता है। इन्हीं उत्सवों में सबसे प्रसिद्ध है बरसाना की लट्ठमार होली।
क्या है लट्ठमार होली की परंपरा
लट्ठमार होली केवल रंग और गुलाल का उत्सव नहीं, बल्कि प्रेम और हास-परिहास की जीवंत अभिव्यक्ति है। इस दिन नंदगांव के हुरियारे (पुरुष) बरसाना पहुंचते हैं, जहां हुरियारिन (महिलाएं) उनका लाठियों से स्वागत करती हैं। पुरुष ढाल लेकर अपने बचाव का प्रयास करते हैं। यह परंपरा बाहरी रूप से भले ही अनोखी लगे, लेकिन इसके पीछे गहरी आध्यात्मिक भावना छिपी है।
कैसे शुरू हुई यह लीला
पौराणिक मान्यता के अनुसार, द्वापर युग में नंदगांव के श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ बरसाना आया करते थे। वे राधा रानी और उनकी सखियों के साथ रंग खेलते, चुटकी लेते और प्रेमपूर्ण छेड़छाड़ करते थे। एक दिन राधा और सखियों ने हंसी-हंसी में लाठियां उठा लीं और कृष्ण व सखाओं को दौड़ा-दौड़ाकर मारने लगीं। कृष्ण ढाल से अपना बचाव करते रहे। यही मधुर लीला आगे चलकर लट्ठमार होली की परंपरा बन गई।
2026 में कब मनाई जाएगी लट्ठमार होली
वर्ष 2026 में फाल्गुन शुक्ल नवमी 26 फरवरी को दोपहर 2:40 बजे तक रहेगी। ऐसे में बरसाना में लट्ठमार होली 25 फरवरी को और नंदगांव में 26 फरवरी को मनाई जाएगी।
आज भी इस अवसर पर देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु ब्रज पहुंचते हैं। मंदिरों में भजन-कीर्तन, फाग गीत और “राधे-राधे” के जयकारों के बीच यह उत्सव प्रेम और भक्ति का अनुपम संगम बन जाता है। लट्ठमार होली हमें सिखाती है कि सच्चा प्रेम लीला बनकर ही आनंद देता है।