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दिव्य सुधा > व्रत और त्योहार > अधिक कालाष्टमी 2026: भगवान कालभैरव की कृपा पाने का दुर्लभ अवसर, जानें पूजा विधि, मंत्र और आरती का महत्व
व्रत और त्योहार

अधिक कालाष्टमी 2026: भगवान कालभैरव की कृपा पाने का दुर्लभ अवसर, जानें पूजा विधि, मंत्र और आरती का महत्व

दिव्यसुधा
Last updated: June 8, 2026 11:55 am
दिव्यसुधा
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अधिक कालाष्टमी 2026 पर भगवान कालभैरव की पूजा करते श्रद्धालु, दीपक और पूजा सामग्री के साथ कालभैरव मंदिर का दृश्य
अधिक कालाष्टमी 2026 पर भगवान कालभैरव की पूजा से प्राप्त होता है विशेष पुण्यफल।
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हिंदू धर्म में कालाष्टमी का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि भगवान शिव के रौद्र स्वरूप भगवान कालभैरव को समर्पित होती है। वर्ष 2026 में 8 जून, सोमवार को पड़ने वाली कालाष्टमी अत्यंत विशेष मानी जा रही है, क्योंकि यह अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) के दौरान आ रही है। इसी कारण इसे “अधिक कालाष्टमी” कहा जा रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अधिक मास में किए गए व्रत, जप, तप और दान का पुण्यफल सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक प्राप्त होता है।

अधिक कालाष्टमी का आध्यात्मिक महत्व
भगवान कालभैरव को समय, न्याय और सुरक्षा का देवता माना जाता है। उन्हें “काशी का कोतवाल” भी कहा जाता है। मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से भगवान कालभैरव की पूजा करता है, उसके जीवन से भय, नकारात्मक शक्तियां, शत्रु बाधाएं और राहु-केतु से जुड़े दोष दूर होते हैं। कालभैरव की कृपा से व्यक्ति को साहस, आत्मविश्वास और सफलता प्राप्त होती है।

इस वर्ष कालाष्टमी सोमवार को पड़ रही है, जो भगवान शिव का प्रिय दिन माना जाता है। ऐसे में शिव और कालभैरव दोनों की कृपा प्राप्त करने का यह अत्यंत शुभ अवसर माना जा रहा है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस दिन की गई साधना मानसिक तनाव, चिंता और नकारात्मक विचारों को दूर करने में सहायक होती है।

अधिक कालाष्टमी 2026 का शुभ मुहूर्त
अष्टमी तिथि 8 जून 2026 को सुबह 03:24 बजे प्रारंभ होगी और 9 जून 2026 को सुबह 03:23 बजे समाप्त होगी। कालभैरव की पूजा के लिए प्रदोष काल और निशिता काल विशेष फलदायी माने जाते हैं। प्रदोष काल में शाम 06:30 बजे से 07:30 बजे तक तथा निशिता काल में रात 12:00 बजे से 12:50 बजे तक पूजा करना शुभ माना गया है।

भगवान कालभैरव की पूजा विधि
कालाष्टमी के दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें। पूजा स्थल को स्वच्छ करके उत्तर-पूर्व दिशा में भगवान शिव और कालभैरव का चित्र या प्रतिमा स्थापित करें। भगवान को गंगाजल, पंचामृत और दूध से स्नान कराएं। इसके बाद चंदन, कुमकुम, अक्षत और पुष्प अर्पित करें।

भगवान कालभैरव के समक्ष सरसों के तेल का दीपक जलाना अत्यंत शुभ माना जाता है। पूजा में काले तिल, काली उड़द, लौंग, कपूर तथा लाल या नीले पुष्प अर्पित करें। इसके बाद रुद्राक्ष की माला से मंत्र जाप करें और भैरव चालीसा तथा कालभैरव अष्टकम का पाठ करें। अंत में कपूर से आरती कर पूजा संपन्न करें।

भगवान कालभैरव का प्रिय भोग
भगवान कालभैरव को मीठी रोटी, उड़द दाल के पकौड़े, उड़द का हलवा, नारियल और जलेबी अत्यंत प्रिय माने जाते हैं। मान्यता है कि इन भोगों को अर्पित करने से भगवान शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

कालभैरव के प्रभावशाली मंत्र
“ॐ भैरवाय नमः”

“ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ स्वाहा”

“ॐ कालकालाय विद्महे तन्नो कालभैरवः प्रचोदयात्”

इन मंत्रों का श्रद्धापूर्वक जाप करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।

कालभैरव आरती का महत्व
कालाष्टमी की पूजा भगवान कालभैरव की आरती के बिना अधूरी मानी जाती है। आरती के माध्यम से भक्त अपने आराध्य के प्रति श्रद्धा और समर्पण व्यक्त करते हैं। मान्यता है कि आरती करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है तथा भय, संकट और नकारात्मकता दूर होती है। अधिक कालाष्टमी पर श्रद्धा और नियमपूर्वक भगवान कालभैरव की पूजा-अर्चना करने से विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है और जीवन में सुख, शांति एवं समृद्धि का आगमन होता है।

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