हिंदू धर्मग्रंथों में मृत्यु को जीवन का अंत नहीं बल्कि एक नए चरण की शुरुआत माना गया है। गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद आत्मा की यात्रा के बारे में विस्तार से वर्णन मिलता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तब उसकी आत्मा तुरंत अपने सभी सांसारिक संबंधों से पूरी तरह अलग नहीं हो पाती। जीवन भर जिन लोगों, स्थानों और यादों से उसका गहरा संबंध रहा होता है, उनसे अलग होना आत्मा के लिए भी एक प्रक्रिया होती है। इसलिए कहा जाता है कि मृत्यु के बाद कुछ समय तक आत्मा अपने घर और परिवार के आसपास ही रहती है।
इसी संदर्भ में एक लोकप्रिय मान्यता यह भी है कि मृत्यु के तीसरे दिन आत्मा एक बार अपने घर लौटती है। वह अपने प्रियजनों, अपने घर के वातावरण और उन स्थानों को देखती है जहाँ उसने जीवन के अनेक वर्ष बिताए थे। यह समय आत्मा के लिए भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ माना जाता है। वह अपने परिवार के लोगों को दुखी और शोक में डूबा हुआ देखती है, लेकिन उनसे बात करने या उन्हें सांत्वना देने में असमर्थ होती है।
कई लोगों का विश्वास है कि इसी कारण उस समय घर में एक अलग तरह का सन्नाटा या भारीपन महसूस होता है। परिवार के सदस्य अक्सर बताते हैं कि तीसरे दिन घर का वातावरण कुछ अलग सा लगता है, जैसे कोई अदृश्य उपस्थिति हो। धार्मिक दृष्टि से इसे आत्मा की अंतिम विदाई का क्षण माना जाता है। आत्मा अपने प्रियजनों को अंतिम बार देखती है और फिर धीरे-धीरे अपनी अगली यात्रा की ओर बढ़ने लगती है।
आत्मा की आगे की यात्रा और धार्मिक परंपराएँ

गरुड़ पुराण में यह भी बताया गया है कि मृत्यु के बाद आत्मा को एक लंबी आध्यात्मिक यात्रा से गुजरना पड़ता है। इस यात्रा में उसे अपने कर्मों के अनुसार विभिन्न अनुभव प्राप्त होते हैं। इसलिए हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद कई धार्मिक क्रियाएँ और संस्कार किए जाते हैं, जैसे अंतिम संस्कार, तेरहवीं, पिंडदान और श्राद्ध। इनका उद्देश्य आत्मा की शांति और उसकी आगे की यात्रा को सुगम बनाना माना जाता है।
मृत्यु के बाद पहले कुछ दिनों तक परिवार के लोग विशेष नियमों और विधियों का पालन करते हैं। तीसरे दिन, दसवें दिन और तेरहवें दिन की रस्मों का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इन दिनों में किए गए मंत्र, प्रार्थना और दान-पुण्य आत्मा को शक्ति और मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
परिवार के लोग इस समय दिवंगत व्यक्ति को याद करते हैं, उसके लिए प्रार्थना करते हैं और ईश्वर से उसकी आत्मा की शांति की कामना करते हैं। यह प्रक्रिया केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि भावनात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण होती है। इससे परिवार को अपने प्रियजन के बिछड़ने के दुख को स्वीकार करने और धीरे-धीरे सामान्य जीवन की ओर लौटने में मदद मिलती है।
हालाँकि यह सभी बातें धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इन मान्यताओं को लेकर भिन्न-भिन्न विचार भी मिलते हैं। फिर भी भारतीय संस्कृति में यह विश्वास गहराई से जुड़ा हुआ है कि मृत्यु के बाद आत्मा अपनी यात्रा जारी रखती है और कुछ समय तक अपने प्रियजनों से भावनात्मक रूप से जुड़ी रहती है।
इसी कारण लोग अपने दिवंगत परिजनों के प्रति सम्मान और श्रद्धा व्यक्त करते हैं, उनके लिए प्रार्थना करते हैं और यह मानते हैं कि उनका आशीर्वाद हमेशा परिवार के साथ बना रहता है।