मार्गशीर्ष माह की कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाने वाली उत्पन्ना एकादशी को सभी एकादशियों में पहली और अत्यंत पवित्र एकादशी माना जाता है। यह व्रत भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को समर्पित होता है। धर्मग्रंथों के अनुसार, इस दिन व्रत रखने और पूजा करने से पापों का नाश होता है, और जीवन में सुख, शांति व समृद्धि आती है।
उत्पन्ना एकादशी की तिथि और शुभ मुहूर्त 2025
तिथि: 15 नवंबर 2025 (शनिवार)
एकादशी तिथि आरंभ: 15 नवंबर, रात 12:49 बजे
एकादशी तिथि समाप्ति: 16 नवंबर, रात 2:37 बजे
नक्षत्र: उत्तर फाल्गुनी
योग: विश्कुंभ
अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:44 से दोपहर 12:27 तक
यह समय पूजा और व्रत आरंभ करने के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। इस दिन भगवान विष्णु की आराधना करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।
उत्पन्ना एकादशी का पौराणिक महत्व
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में मुर नामक एक असुर के अत्याचारों से देवता और मनुष्य दोनों परेशान थे। तब भगवान विष्णु ने उसकी विनाश लीला रचने के लिए अपनी शक्ति से एकादशी देवी को उत्पन्न किया। देवी ने मुरासुर का वध किया, और उसी दिन को उत्पन्ना एकादशी कहा गया। इसीलिए इसे सभी एकादशियों की जननी कहा जाता है। इस व्रत के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर की नकारात्मकता, क्रोध, लोभ और अहंकार का नाश करता है और ईश्वर के प्रति समर्पण भाव विकसित करता है।
व्रत और पूजा विधि
उत्पन्ना एकादशी के दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ व पीले वस्त्र धारण करें। भगवान विष्णु के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित करें और उन्हें पीले फूल, तुलसी दल, पीले फल और मिठाई अर्पित करें। भक्त इस दिन निर्जला या फलाहारी व्रत रखते हैं और दिनभर भगवान विष्णु का ध्यान करते हैं। शास्त्रों में इस दिन अनाज, चावल और दालों का सेवन वर्जित माना गया है। रात्रि में भजन-कीर्तन या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने से व्रत पूर्ण होता है।
व्रत का फल और महत्व
उत्पन्ना एकादशी व्रत करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और जीवन में शुभ फल की प्राप्ति होती है। यह व्रत मोक्ष प्रदायक माना गया है, जिससे जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिलती है। भगवान विष्णु की कृपा से साधक के जीवन में सुख, शांति और आध्यात्मिक समृद्धि आती है।