ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों की स्थिति और प्रभाव मानव जीवन के सुख-दुःख, सफलता-असफलता और स्वास्थ्य से गहराई से जुड़ी होती है। प्रत्येक ग्रह व्यक्ति के जीवन में किसी न किसी प्रकार से प्रभाव डालता है। जब ये ग्रह शुभ स्थिति में होते हैं, तो जीवन में उन्नति, सुख और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करते हैं, लेकिन जब यही ग्रह अशुभ या अनिष्टकारी स्थिति में आ जाते हैं, तो अनेक प्रकार के कष्ट और बाधाएँ उत्पन्न करते हैं। आइए जानते हैं कि कौन-सा ग्रह अपनी अशुभ स्थिति में किस प्रकार का दुःख देता है।
सूर्य ग्रह से प्राप्त कष्ट
सूर्य अग्नि तत्व प्रधान ग्रह है और शरीर की जठराग्नि तथा ऊर्जा का कारक है। जब सूर्य कमजोर या पाप प्रभाव में होता है, तब व्यक्ति को ज्वर, पित्त, अतिसार और क्षय रोगों का सामना करना पड़ता है। कार्यस्थल पर वरिष्ठ अधिकारियों से विवाद, सरकारी मामलों में बाधा और आत्मसम्मान को ठेस जैसी स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।
चन्द्रमा से प्राप्त कष्ट
चन्द्रमा मन और भावनाओं का कारक है। इसके निर्बल होने पर व्यक्ति मानसिक रूप से अस्थिर, चिंताग्रस्त और भयभीत रहता है। नींद न आना, अवसाद, जल से भय या जलजनित रोगों की संभावना बढ़ जाती है। चन्द्रमा की अशुभ दशा मन की शांति और संतुलन को प्रभावित करती है।
मंगल ग्रह से प्राप्त कष्ट
मंगल क्रोध, साहस और ऊर्जा का प्रतीक है। इसके अनिष्टकारी होने पर व्यक्ति दुर्घटना, चोट, आग या झगड़ों का शिकार बनता है। अत्यधिक क्रोध और उग्रता से वैवाहिक जीवन में तनाव उत्पन्न होता है। कानूनी झंझटों और शत्रुओं से संघर्ष की संभावना रहती है।
बुध ग्रह से प्राप्त कष्ट
बुध बुद्धि, वाणी और विवेक का ग्रह है। इसके कमजोर होने से व्यक्ति की स्मरणशक्ति कमजोर होती है, निर्णय लेने में कठिनाई होती है और वाणी में दोष उत्पन्न होते हैं। संचार में भ्रम, व्यापारिक नुकसान और शिक्षा में बाधाएं भी देखी जाती हैं।
गुरु ग्रह से प्राप्त कष्ट
गुरु ज्ञान, धर्म, भाग्य और संतानों का प्रतिनिधित्व करता है। इसके अशुभ होने पर व्यक्ति के जीवन में सामाजिक सम्मान की हानि, विवाह में विलंब और लिवर संबंधी रोग उत्पन्न हो सकते हैं। बड़े-बुजुर्गों से मतभेद और आत्मिक असंतोष की भावना भी बढ़ती है।
शुक्र ग्रह से प्राप्त कष्ट
शुक्र प्रेम, सौंदर्य और भौतिक सुखों का प्रतीक है। इसके निर्बल होने से वैवाहिक जीवन में कलह, प्रेम संबंधों में तनाव और प्रजनन संबंधी समस्याएँ होती हैं। भोग-विलास में कमी और जीवनसाथी से विरोध की स्थिति बनती है।
शनि ग्रह से प्राप्त कष्ट
शनि कर्म, अनुशासन और न्याय का प्रतीक ग्रह है। जब यह अशुभ होता है, तब जीवन में कठिनाइयाँ, विलंब, संघर्ष और मानसिक दबाव बढ़ जाते हैं। हड्डियों, नसों और जोड़ों से संबंधित रोग प्रकट होते हैं, तथा सफलता में विलंब होता है।
राहु और केतु से प्राप्त कष्ट
राहु भ्रम, लालच और मानसिक विकारों का कारक है। इसके दोषी होने पर व्यक्ति को मानसिक तनाव, भ्रम और अस्थिरता होती है। केतु के अशुभ प्रभाव से व्यक्ति को एकाकीपन, रिश्तों में मतभेद और आकस्मिक दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ सकता है।
ग्रहों के शुभ-अशुभ प्रभाव जीवन में सुख-दुःख का निर्धारण करते हैं। इसलिए ज्योतिषीय उपायों जैसे दान, मंत्रजाप, और ग्रह शांति पूजा के माध्यम से इनके दुष्प्रभावों को कम किया जा सकता है। ग्रहों की कृपा से जीवन में संतुलन, शांति और सफलता संभव है।