भाद्रपद माह की शुक्ला एकादशी (अगस्त–सितंबर) को हर साल आदिवासी समाज में करमा पर्व बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह पर्व करम देवता को समर्पित है, जो शक्ति, यौवन और प्रकृति की संजीवनी का प्रतीक माने जाते हैं। खेती-किसानी पर आधारित यह उत्सव आदिवासी जीवनशैली में प्रकृति के महत्व को उजागर करता है।
व्रत और रस्में: जवा बीज, करम डाली और सामूहिक पूजा
करमा पर्व की तैयारियां कई दिन पहले से शुरू हो जाती हैं। जवा बीज बोना: सात से नौ प्रकार के बीज (धान, जौ, गेहूं, मक्का आदि) को टोकरी में बोकर 7–9 दिनों तक उनका पालन किया जाता है। महिलाओं की भागीदारी: यह व्रत मुख्य रूप से अविवाहित लड़कियां करती हैं, जो भाई की लंबी उम्र और परिवार की समृद्धि की कामना करती हैं। करम वृक्ष की डाली: पूजा के दिन गांव के लोग—खासतौर पर युवतियां—जंगल से करम वृक्ष की डाली लाती हैं। डाली को दूध, सूखे फूल, प्रसाद और पारंपरिक पेय के साथ पूजकर गांव के बीच में लगाया जाता है।
कथाएँ और संदेश: सात भाइयों की कथा से प्रकृति सम्मान का सबक
इस पर्व के पीछे एक प्रसिद्ध कथा है— सात भाइयों की पत्नियां करम डाली के साथ गीत और नृत्य में व्यस्त थीं। भोजन देर से मिलने पर भाइयों ने क्रोधित होकर करम वृक्ष को नदी में फेंक दिया। परिणामस्वरूप, उनके जीवन में दुःख और अशांति आ गई। बाद में उन्होंने करम देवता की पूजा की और खुशहाली लौटी। यह कहानी हमें सिखाती है कि प्रकृति का अनादर करने से नुकसान होता है और सम्मान व कृतज्ञता से जीवन में समृद्धि आती है।
करमा नृत्य और सामूहिक उत्सव
पूजा के बाद रात में करमा नाच का आयोजन होता है। गोल घेरे में नृत्य: पुरुष और महिलाएं ढोलक की थाप और लोकगीतों पर गोल घेरे में नृत्य करते हैं। सामुदायिक भोज: चावल की खीर, पारंपरिक शराब (हड़िया या हरिया) और अन्य स्थानीय पकवान प्रसाद के रूप में बांटे जाते हैं। डाली का विसर्जन: अगले दिन करम वृक्ष की डाली नदी या तालाब में विसर्जित की जाती है।
सामाजिक, पारिवारिक और पारिस्थितिक महत्व
भाई–बहन का बंधन: बहनें करमा व्रत रखकर अपने भाइयों की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। प्रकृति और खेती का सम्मान: करम वृक्ष की पूजा प्रकृति की उर्वरता और पर्यावरण संतुलन के प्रति आदिवासी समाज की गहरी आस्था दर्शाती है। सहयोग और समरसता: यह त्योहार आदिवासी समाज में सहयोग, भाईचारा और सांस्कृतिक एकता को बढ़ावा देता है।
सांस्कृतिक एकता और आधुनिक स्वरूप
अब करमा पर्व का आयोजन सिर्फ गांवों तक सीमित नहीं है। शहरी क्षेत्र: शहरों और शैक्षणिक संस्थानों में भी करमा पर्व मनाया जाने लगा है। उदाहरण: रांची में “करम अखाड़ा” जैसे कार्यक्रम होते हैं, जहां ढोल–वाद्य यंत्रों और स्थानीय कलाकारों के जरिए सांस्कृतिक धरोहर को नया मंच मिलता है। पर्यावरण-मित्र रिवाज: आधुनिक स्वरूप में भी करमा पर्व अपनी जड़ों से जुड़ा है और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है।
करमा पर्व 2025: समाज को जोड़ने वाला उत्सव
करमा पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति-पूजा, पारिवारिक संबंध, सामुदायिक सहयोग और सांस्कृतिक गौरव का संगम है। इस पर्व के जरिए आदिवासी समाज हमें यह सिखाता है कि प्रकृति और रिश्तों का सम्मान जीवन को समृद्ध और संतुलित बनाता है।