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दिव्य सुधा > व्रत और त्योहार > रक्षाबंधन 2025: प्रेम, परंपरा और पौराणिकता का पवित्र संगम
व्रत और त्योहार

रक्षाबंधन 2025: प्रेम, परंपरा और पौराणिकता का पवित्र संगम

रक्षाबंधन 2025 का पर्व 18 अगस्त को मनाया जाएगा।

दिव्यसुधा
Last updated: August 8, 2025 2:51 pm
दिव्यसुधा
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जब रक्षासूत्र बना धर्म और प्रेम का प्रतीक, और लक्ष्मी ने दिखाई भाईचारे की शक्ति!
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Highlights
  • यह पर्व भाई-बहन के रिश्ते के प्रेम, समर्पण और सुरक्षा के भाव को दर्शाता है।
  • रक्षाबंधन से जुड़ी एक प्रमुख पौराणिक कथा मां लक्ष्मी और राजा बलि की है।
  • यह कथा बताती है कि किस प्रकार एक रक्षासूत्र ने भगवान विष्णु को उनके धाम लौटाया।

नई दिल्ली। रक्षाबंधन का पर्व भारतीय संस्कृति में प्रेम, पवित्रता और परंपरा का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व मुख्यतः भाई-बहन के अटूट रिश्ते को सम्मानित करने और उनकी सुरक्षा की भावना को दर्शाने के लिए मनाया जाता है। वर्ष 2025 में रक्षाबंधन का यह पावन उत्सव 18 अगस्त, सोमवार को मनाया जाएगा।

इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी या रक्षासूत्र बांधती हैं और उनके लंबी उम्र, स्वास्थ्य और सुखद भविष्य की कामना करती हैं। इसके उत्तर में भाई अपनी बहन को रक्षा का वचन देते हैं और उपहार स्वरूप स्नेह भेंट करते हैं।

रक्षाबंधन का पर्व केवल एक रिवाज भर नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की गहराई और पौराणिकता से जुड़ा हुआ है। इस पर्व से जुड़ी अनेक कथाएं हैं, जिनमें सबसे प्रसिद्ध कथा है — मां लक्ष्मी और राजा बलि की कथा, जो इस त्योहार को धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से और भी अधिक महत्वपूर्ण बना देती है।

पौराणिक कथा: जब मां लक्ष्मी ने राजा बलि को बनाया भाई
स्कंद पुराण, पद्म पुराण, और श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित इस कथा के अनुसार, असुरराज बलि एक अत्यंत बलशाली और धर्मनिष्ठ राजा थे। समय के साथ उन्हें अपनी शक्तियों पर अभिमान हो गया। तब भगवान विष्णु ने उनकी परीक्षा लेने के लिए वामन अवतार धारण किया।

वामन रूप में भगवान विष्णु राजा बलि के समक्ष पहुंचे और उनसे मात्र तीन पग भूमि का दान मांगा। बलि ने सहर्ष यह दान स्वीकार कर लिया। लेकिन जब वामन भगवान ने एक पग में धरती और दूसरे पग में आकाश को नाप लिया, तब तीसरे पग के लिए कोई स्थान नहीं बचा। तब राजा बलि ने अपना सिर भगवान के आगे झुका दिया और उन्हें तीसरा पग अपने मस्तक पर रखने को कहा।

राजा बलि की यह दानवीरता देखकर भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें पाताल लोक का अधिपति बना दिया। राजा बलि ने बदले में भगवान से आग्रह किया कि वे पाताल लोक में उनके साथ ही रहें। भगवान ने यह वचन स्वीकार कर लिया, लेकिन इससे देवी लक्ष्मी को चिंता होने लगी।

राखी ने निभाया धर्म का काम
भगवान विष्णु के पाताल लोक में निवास करने से माता लक्ष्मी चिंतित हो गईं, क्योंकि वे अपने पति के वियोग को सहन नहीं कर पा रही थीं। तब उन्होंने एक युक्ति निकाली। माता लक्ष्मी ने एक साधारण गरीब स्त्री का वेश धारण किया और एक रक्षासूत्र (राखी) लेकर राजा बलि के पास पहुंचीं।

उन्होंने राजा बलि से उन्हें भाई मानने की इच्छा जताई और राखी बांध दी। बलि ने इस बहन-भावना का मान रखते हुए उन्हें अपनी बहन के रूप में स्वीकार किया और उन्हें उपहार मांगने को कहा। तब देवी लक्ष्मी ने अपने वास्तविक रूप का दर्शन कराया और आग्रह किया कि वे भगवान विष्णु को उनके धाम लौटने दें। राजा बलि ने राखी की मर्यादा रखते हुए यह वरदान दे दिया और भगवान विष्णु को वैकुंठ लौटने की अनुमति दी।

समाज में रक्षाबंधन का प्रभाव
इस कथा से यह स्पष्ट होता है कि रक्षाबंधन मात्र एक पारिवारिक त्योहार नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और सामाजिक बंधन का प्रतीक भी है। रक्षाबंधन के माध्यम से एक रक्षासूत्र ने भगवान को उनके धाम वापिस भेजा, बहन-भाई के रिश्ते में श्रद्धा और समर्पण का सर्वोच्च आदर्श प्रस्तुत किया।

रक्षाबंधन न केवल हिंदू धर्म में बल्कि जैन, सिख और बौद्ध परंपराओं में भी आपसी भाईचारे और आत्मीयता का संदेश देता है। आज यह त्योहार सीमाओं और मजहबों से परे जाकर एक वैश्विक त्योहार बनता जा रहा है।

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